देश में 25 मई से जब घरेलू उड़ानें फिर से शुरू हुईं, तो मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट के हिस्से 50 फ्लाइट्स आईं। पिछले 5 दिनों से यहां हर दिन 25 फ्लाइट्स उड़ान भरती हैं और इतनी ही लैंड करती हैं। हर दिन 700 से ज्यादा फ्लाइट्स के मूवमेंट वाले इस एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट्स की यह संख्या बहुत ही कम है।
जो भीड़ और भागदौड़ यहां पहले नजर आती थी, अब वैसा नजारा बिल्कुल दिखाई नहीं देता। औसतन हर घंटे 2 ही फ्लाइट होने के कारण एयरपोर्ट पर सन्नाटा पसरा होता है। हाल यह है कि कभी-कभी तो यात्रियों से ज्यादा एयरपोर्ट कर्मचारी नजर आ जाते हैं।
फेस शील्ड, मास्क या पीपीई किट पहने ये कर्मचारी एयरपोर्ट पर कोरोना से बचाव के लिए सभी नियमों का खुद तो पालन करते ही हैं, साथ ही यात्रियों से भी करवाते हैं। यहां कोरोना से बचाव के लिए कुछ नए तरीके भी इजाद किए गए हैं। ऐमें में हम हर दूसरे मिनट में एक फ्लाइट के मूवमेंट वाले देश के इस दूसरे सबसे व्यस्त एयरपोर्ट की कुछ लाइव तस्वीरें आपके लिए लाए हैं..
मुख्य रनवे के पास की फ्लाइट पार्किंग एरिया में एयर इंडिया, स्पाइसजेट, इंडिगो सहित अन्य कई एयरलाइंस के विमान खड़े नजर आते हैं।
मुंबई एयरपोर्ट के अंदर लगे बैरिकेड, स्टील की रेलिंग, सीआईएसएफ के सुरक्षा कर्मियों के खड़े होने की जगह लगातार सैनेटाइज होती है। एयरपोर्ट की जिस सड़क से गाड़ियां गुजर रही हैं, उसे भी सैनेटाइज किया जा रहा है।
सीआईएसएफ के जवान यात्रियों की एयरपोर्ट में एंट्री से पहले उनके हाथों पर सैनेटाइजर का छिड़काव करने और शरीर की थर्मल स्क्रीनिंग करने जैसे नियमों का सख्ती से पालन करते नजर आते हैं।
यहां एयरपोर्ट पर जहां यात्रियों को अपना बोर्डिंग पास और पहचान पत्र दिखाना होता है, वहां एक कारपेट बिछाया गया है। इस कारपेट पर सैनेटाइज किया जाने वाला लिक्विड है, जिससे कोई भी यात्री कारपेट पर कदम रखता है, तो उसके जूतों का निचला हिस्सा सैनेटाइज हो जाता है। इससे एयरपोर्ट के बाकी फर्श को यात्री के जूतों से फैलने वाले कोरोना से बचाया जा सकता है।
पैसेंजर भी अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फेस शील्ड और पीपीई कीट पहने नजर आते हैं।
गेट पर ही एक पारदर्शी कांच का कैबिनबनाया गया है। यहां यात्री कांच के दूसरी ओर से पहचान पत्र दिखाते हैं।यहां पैसेंजर के बोर्डिंग पास की स्कैनिंग करने वाली छोटी सी एक मशीन रखी गई है। इन दोनों प्रक्रियाओं में पैसेंजर और एयरपोर्ट कर्मचारी एक-दूसरे को टच नहीं करते हैं।
सिक्योरिटी चेकिंग के दौरान यात्रियों के सामान को सुरक्षाकर्मी हाथ नहीं लगाते। जिस ट्रे में पैसेंजर का सामान स्कैनिंग मशीन से गुजर कर दूसरी ओर पहुंचता है तो उसे लकड़ी की स्टीक के सहारे सुरक्षाकर्मी आगे बढ़ा देते हैं।
एयरपोर्ट की मुख्य लॉबी में पहले की तरह ही एक बड़ी सी स्क्रीन पर फ्लाइट्स की जानकारी दी जाती है। इसके अलावा इन्फॉर्मेशन काउंटर पर भी एयरपोर्ट कर्मचारी पहले की तरह ही जानकारी देते रहते हैं। फर्क बस इतना है कि यहां लोग एक-दूजे से पर्याप्त दूरी बनाकर खड़े होते हैं।
हर काउंटर पर सैनेटाइजर रखा हुआ होता है। एयरपोर्ट कर्मचारी फेस शील्ड और मास्क लगाए हुए होते हैं।
कम फ्लाइट्स होने के कारण भीड़ कम है। लोग सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान तो रखते हैं लेकिन कहीं-कहीं लोग झुंड में खड़े भी नजर आते हैं। ऐसा होने पर एयरपोर्ट कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी उन्हें दूर-दूर खड़े रहने या चलने की हिदायत देते नजर आते हैं।
आम दिनों में ये सभी कुर्सियां लगभग भरी होती हैं।
मुंबई एयरपोर्ट का फूड कोर्ट कई तरह की वैरायटी के खाने-पीने की चीजों के लिए काफी मशहूर है। यहां आम दिनों में 3500 से ज्यादा पैसेंजर आते हैं। लेकिन फिलहाल महज 50 प्लाइट की मूवमेंट होने के कारण 300-350 यात्री ही फूड कोर्ट आ रहे हैं।
कुछ एयरपोर्ट कर्मचारी पीपीई कीट में भी नजर आते हैं।
यहां के रिजर्वड लाउंज में पैसेंजर के बैठने की व्यवस्था बहुत दूर-दूर की गई है। दो लक्जरी सोफानुमा कुर्सियां साथ में भी हैं, लेकिन इनमें एक ही शख्स बैठ सकता है। जीवीके लाउंज की क्षमता 350 पैसेंजर के बैठने की है। लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग मैंटेन करने के लिए इसे 200 कर दिया गया है।
लाउंज में यात्री पास-पास न बैठे इसके लिए कुछ इस तरह इंतजाम किए गए हैं।
एयरपोर्ट की मुख्य लॉबी में ही गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, सीनियर सिटिजन्स को फ्लाइट तक छोड़ने और वहां से लाने के लिए बैटरी से चलने वाली छोटी कारें लाइन से खड़ी नजर आती हैं।
यात्रियों को दूर-दूर खड़ा रखा जा सके इसके लिए 6-6 फीट की दूरी पर चार पत्तियों की फूल की डिजाइन बनाई गई है।
एयरपोर्ट पर उतरने वाले जिन यात्रियों के पास घर जाने का खुद का साधन नहीं है। उन्हें बहुत परेशानियां का सामना करना पड़ रहा है। लॉकडाउन की वजह से एयरपोर्ट के बाहर न प्रीपेड टैक्सी मिल रही है, न ही ओला-ऊबर की कारें चल रही हैं। दूर-दूर तक ऑटो-रिक्शा भी नहीं दिखाई दे रहे।
आमदिनों में मुंबई एयरपोर्ट में इस तरह भीड़-भाड़ वाला नजारा दिखा करता था। यहां से औसतन हर महीने 35 लाख से ज्यादा यात्रियों का मूवमेंट होता था।
सरकार ने 25 मार्च को देशभर में लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी। इस दौरान दूध, दवाई जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई जारी रखने के निर्देश थे। ऐसे में कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के एक शख्स कावीडियो वायरल हुआथा। वीडियो में दिख रहा युवक लॉकडाउन में बाहर घूमने के लिए फर्जी दूधवाला बनकर निकला था। हालांकि पुलिस ने जब कड़ाई से पूछा तो उसने सच बता दिया।
राजधानी दिल्ली स्थित लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वुमन के साइकोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर कनिका के आहूजा का मानना है किजिन लोगों में रिस्कटेकिंग बिहेवियर होता है, वो ऐसा करते हैं। यानी ऐसे लोग डर की परवाह नहीं करते।इस तरह के काम करने वालों के मन में हमेशा कुछ थ्रिल करने की इच्छा रहती है। कुछ एक्सपर्ट्स जिज्ञासा भी इसका कारण बताते हैं।
एक्सपर्ट्स हिदायत देते हैं किलॉकडाउन में घर से बाहर निकलने को चैलेंज की तरह कतई न लें। खासकर,युवा यह न सोचें कि उन्हें कुछ नहीं होगा, क्योंकि वे जवान हैं।
करीब दो महीने से चल रहे इस लॉकडाउन के दौरान कुछ ऐसी तस्वीरें भी सामने आईं थीं, जहां लोग न तो मास्क पहन रहेऔर न ही सोशल डिस्टेंसिंगका पालन कर रहे।ऐसे में सवाल उठता है कितमाम कोशिशों और अलर्ट के बाद भी लोग इन सावधानियों को गंभीरता से क्यों नहीं ले रहे हैं?एक्सपर्ट्स बता रहे हैं, इसके पीछे की प्रमुखवजह।
कुछ लोग क्यों नहीं पहन रहे मास्क ?
भोपाल की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर पूनम सिंह बताती हैं कि नियमों का पालन नहीं करने वाले समूह में बच्चे और यंग एडल्ट्स शामिल हैं। यह लोग रिस्क एसेसमेंट कर रहे हैं। मीडिया में आ रहीं खबरों के मुताबिक इस वायरस से सबसे ज्यादा जोखिम में गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग हैं। ऐसे में इन लोगों को लगता है किहमें ज्यादा खतरा नहीं है,इसलिए हम कुछ चीजें कर सकते हैं। वहीं, बागी रवैये वाले बच्चे विरोध के बाद भी घर से निकल रहे हैं। उन्हें ऐसा लगता है किवे खुद पर काबू कर हालात पर नियंत्रण कर पाएंगे। वे मानते हैं कि, ऐसा करने पर उन्हें कुछ नहीं होगा।
सोशल डिस्टेंसिंग का पालननहीं करने के पीछे क्या कारण हैं?
डॉक्टर आहूजा बताती हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन मध्यम या उच्च वर्ग कर पा रहा है, क्योंकि इसे अपनाना कई लोगों की हैसियत से परे है। कई बार घर में 6 फीट की दूरी बनाना कई बार मुमकिन नहीं है, क्योंकि कई घरों में जगह कम और लोग ज्यादा होते हैं। लॉकडाउन में घर बैठने का मतलब है, आपके पास घर या संसाधन मौजूद होना।'
डॉक्टर आहूजा बताती हैं कि एक तबका हैंड वॉश और साफ पानी जैसी चीजों से भी वंचित है। आपको घर से निडर होकर बाहर निकलना होगा और अपने आसपास डिफेंस मैकेनिज्म बनाना होगा। जब आपके अंदर अस वर्सेज देम वाली फीलिंग आ जाती है और आप सोचते हैं कि इससे होने वाला नुकसान मैं क्यों उठाऊं, जैसे इकोनॉमिक और सोशल लॉस। आप खुद को उन लोगों से अलग कर लेते हैं, जिन्हें कोविड से ज्यादा खतरा है।
डॉक्टर आहूजा के मुताबिक लोगों के दिमाग में अगर मरने का डर होगा तो यह नहीं करेंगे। इसे रोकने के लिए जागरूकता लानी होगी। क्योंकि आप बाहर से आकर घर वालों को भी खतरे में डाल सकते हैं।
बिहेवियरल फैटीग का शिकार हो रहे हैं लोग
डॉक्टर आहूजा बताती हैं किलॉकडाउन के शुरुआती दौर का पालन बड़ी ही सख्ती के साथ हुआ था। लोग कई चीजों को लेकर डरे हुए होने के साथ-साथ उत्साहित भी थे। लंबे समय तक घर में रहकर लोग बिहेवियरल फैटीग का शिकार हो रहे हैं। ऐसे हालात में लोग काफी वक्त से चले आ रहे अपने रुटीन से थक जाते हैं और उन्हें अपनी प्रैक्टिसेज का फायदा नहीं मिलता।
उदाहरण के लिए लोग सफाई को लेकर काफी सजग थे, लेकिन समय के साथ जब उन्होंने देखा कि इसका परिणाम कुछ खास नहीं मिल रहा है, तो वे थक गए थे, क्योंकि वे उन लोगों को भी देख रहे हैं, जो सावधानियों को लेकर गंभीर नहीं थे, लेकिन उनकी हालत भी हमारी ही तरह है।
लोग जानबूझ बाहर क्यों निकल रहे हैं?
रिस्पेक्ट: लॉकडाउन के दौरान घर से बाहर निकलने को लोग चैलेंज की तरह ले रहे हैं। लोगों के मन में खासकर बच्चों के बीच यह धारणा बन चुकी है किअगर वे बाहर निकलेंगे तो उनकी सोशल रिस्पेकट बढ़ेगी। वे यह कह सकेंगे कि जब कोई ऐसा नहीं कर पा रहा, तब वे ऐसा कर रहे हैं।
घर पर बिगड़ते हालात: घर पर लगातार रहने से हालात बिगड़ रहे हैं। पाबंदियां लगने के कारण लोग घर से बाहर निकल रहे हैं। घर में दबाव बन रहा है। इसलिए रिस्क लेकर भी घर से बाहर निकल रहे हैं।
कुछ नहीं होगा: जो लोग बाहर निकल रहे हैं या साथ में स्मोक शेयर कर रहे हैं, वो मान चुके हैं किहमें कुछ नहीं होगा और अगर कुछ हो भी गया तो खास फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि हम जवान हैं।
लॉकडाउन के बीच लोगरीति-रिवाज को क्यों इतनातवज्जों दे रहे हैं?
दुनियाभर की कई लैब्स में कोविड 19 को हराने के लिए वैक्सीन की खोज की जा रही है। साइंटिस्ट दावा कर रहे हैं कि कोरोना की वैक्सीन सितंबर के अंत तक आ सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह इतिहास का सबसे तेज वैक्सीन प्रोग्राम होगा। दवा न मिलने की स्थिति में कोरोना से बचने का उपाय है मास्क पहनना और सोशल डिस्टेंसिंग करना।
सभी चेतावनियों के बाद भी लोग शादी, जन्मदिन, सालगिरह जैसे कई आयोजन कर रहे हैं और इसमें भीड़ भी शामिल हो रही है। डॉक्टर सिंह बताती हैं किघर वालों, समाज के दबाव और रूढ़ीवादी सोच के कारण रीति रिवाज को मानना जरूरी हो रहा है। लोगों के बीच यह विचार विकसित नहीं हुए हैं कि इन सब चीजों के बारे में गहनता से सोचें।
डॉक्टर सिंह कहती हैं कि सोशल कस्टम इसलिए फॉलो किए जा रहे हैं, ताकि लोग हमारे बारे में गलत न सोचें। लोग इस मौके को अपने ताकत के प्रदर्शन की तरह भी उपयोग कर रहे हैं। वे इस दौरान कई दावे कर खुद को बड़ा साबित करने में लगे हुए हैं। साथ ही लोग समाज के डर के कारण ही अपनी ट्रेवल हिस्ट्री भी बताने में हिचक रहे हैं।
डॉक्टर सिंह के मुताबिक, लोगों को लग रहा है कि अगर वे अपनी बीमारी के बारे में किसी को बता देंगे, तो लोग उन्हें रिजेक्ट कर देंगे। आमतौर पर ऐसा देखने में भी आ रहा है। कोई भी संक्रमण को अपनी मर्जी से तो नहीं लेता है।
फ्रंटलाइन वर्कर्स कोलोग गुस्से का शिकार क्यों बना रहे?
कुछ वक्त पहले देश के कई हिस्सों से डॉक्टर और पुलिस समेत कई फ्रंटलाइन वर्कर्स पर हमले की खबरें आईं थीं। लोगों ने सैंपल लेने पहुंची स्वास्थ्य कर्मियों की टीम पर जानलेवा हमले किए। वहीं, कई जगहों पर सुरक्षा इंतजामों नियमों को पालन करवाने में लगे पुलिसकर्मी भी इन हमलों का शिकार हुए। डॉक्टर सिंह इसके पीछे का कारण अफवाहों को बताती हैं।
डॉक्टर पूनसिंह के मुताबिकलोअर सोशियो इकोनॉमिक वर्ग इस तरह की हरकतें कर रहे हैं। लोग पढ़े-लिखे नहीं होने के कारण दूसरों की बातों में आकर ऐसा कर रहे हैं। लोगों को डर है कि, पता नहीं ये हमें कहां लेकर जाएंगे या क्या खिलाएंगे। जबकि डॉक्टर आहूजा पुलिसकर्मियों के साथ हो रही बदसलूकी का जिम्मेदार भड़ास को मानती हैं।
डॉक्टर आहूजा ने कहती हैं कि नियम नहीं मानने पर पुलिसकर्मी फटकार लगाते हैं तो लोग तब प्रतिक्रिया देते हैं जब वे समूह में होते हैं। अकेले में इनका बर्ताव बदल जाता है। उन्होंने कहा कि, ये लोग कोविड पर गुस्सा नहीं निकाल पा रहे हैं, ऐसे में खुद को तसल्ली देने और आत्मविश्वास दिलाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
शराब के लिए लोग लाइन में क्याें लग रहे?
लॉकडाउन 3.0 में सरकार ने रेवेन्यू बढ़ाने के लिए शराब की दुकानें खोलने का फैसला किया था। इस दौरान महीनों से बिना शराब के चल रहे शौकीनों ने राजधानी दिल्ली में दुकान के बाहर करीब 1 किमी लंबी लाइन लगा ली। हालांकि इस लाइन में जो केवल एक वर्ग नजर आ रहा था, वह था शराब के शौकीनों का।
डॉक्टर पूनमसिंह कहती हैं कि इसमें सबसे बड़ी परेशानी है लत, जो लोग एडिक्टेड हैं वे डर की परवाह नहीं करते हैं। यह एक तरह का डिसॉर्डर है। इससे जूझ रहे लोग कोई भी रिस्क लेने के लिए तैयार हैं। उन्हें किसी भी तरह से इसे हासिल करना है। इसके अलाव कुछ लोग कुछ लोगों में एंटी सोशल पर्सानालिटी होती है और उन्हें नियम तोड़ने में मजा आता है। जो भी नियम बनाए जाएंगे वे तोड़ेंगे।
घर में रहकरदिमाग कोशांत कैसे रखें?
फिजीकल एक्सरसाइज: घर में मूवमेंट जरूर करते रहें। अवसाद से ग्रस्त लोगों में दो लक्षण दिखाई देते हैं, जिसमें अकेले रहना और एक जगह पर बने रहना शामिल है। पूरे दिन घर में बंद न रहे और सनलाइट लें।
लोगों से बातचीत करें: घर में रहने के दौरान लोगों से बातचीत करें। इसके लिए फोन कॉल से ज्यादा अच्छा है वीडियो कॉल पर बात करना। क्योंकि इसमें आप सामने वाले का चेहरा देखते हैं। इससे आपको और दूसरों को तसल्ली मिलती है।
हेल्दी टच: भारत में टच का बहुत महत्व है। हम आमतौर में भी घर में एक दूसरे को प्यार से, आशीर्वाद लेने में, आदर करने में छूते हैं। लेकिन कोरोनावायरस के कारण यह एकदम बंद हो गया है। टच बहुत जरूरी है। कम से कम घरवालों के साथ शारीरिक तौर पर व्यक्त करें। आप गलें मिल सकते हैं, हाथ मिला सकते हैं।
आज वर्ल्ड नो टोबैको डे है। इस साल की थीम है युवाओं को तम्बाकू और निकोटीन के दूर रखने के साथ उन झांसों से भी बचाना, जिससेकम्पनियां उन्हें धूम्रपान करने के लिए आकर्षित करती है। तम्बाकू से कमजोर हुए फेफड़े कोरोनावायरस को संक्रमण का दायरा बढ़ाने में मुफीद साबित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) और शोधकर्ताओं ने भी चेतावनी दी है।
एक सर्वे कहता है, 27 फीसदी टीनएजर्स ई-सिगरेट पीते हैं। उनका मानना है कि ये स्मोकिंग नहीं सिर्फ फ्लेवर है और सेहत के लिए खतरनाक नहीं। इस पर मेदांता की विशेषज्ञ डॉ. सुशीला का कहना है, यह एक गलतफहमी है, वैपिंग भी सिगरेट पीने जितना खतरनाक है।
वर्ल्ड नो टोबैको डे पर जानिए कोरोना और तम्बाकू का कनेक्शन, इस मुद्देपर डब्ल्यूएचओ और मेदांता हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट की डायरेक्टर डॉ. सुशीला कटारिया की सलाह।
लॉकडाउन तम्बाकू छोड़ने का सबसे अच्छा समय
डॉ. कटारिया कहती हैं, तम्बाकू छोड़ने के लिए लॉकडाउन सबसे अच्छा समय है। तम्बाकू छोड़ने के लिए कम से कम 41 दिन का समय चाहिए होता है। अगर तीन महीने तक कोई तम्बाकू नहीं लेता या स्मोकिंग नहीं करता तो वापस इसे शुरू करने की आशंका 10 फीसदी से भी कम रह जाती है। आप लॉकडाउन के दौरान दुनिया के सबसे बड़े एडिक्शन से पीछा छुड़ा सकते हैं।
टीनएजर्स में सिगरेट से ज्यादा आसान ई-सिगरेट की लत पड़ना
कुछ लोग कहते हैं हम तो सिगरेट नहीं ई-सिगरेट पी रहे हैं और इसका बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। इस पर डॉ. सुशीला कटारिया का कहना है कि ई-सिगरेट में खासतौर पर एक लिक्विड होता है, जिसमें अक्सर निकोटिन के साथ दूसरे फ्लेवर होते हैं। हमे इसकी लत लग जाती है और फेफड़े भी डैमेज होते हैं।
इन दिनों यह कई फ्लेवर में उपलब्ध हैं ऐसे में बच्चों में इसकी लत लगना सिगरेट से भी ज्यादा आसान है। ई-सिगरेट की आदत पड़ने के बाद सिगरेट और तम्बाकू की लत पड़ना काफी आसान हो जाता है, ऐसा कई शोध में भी सामने आया है।
4 सवालों में डब्ल्यूएचओ की नसीहत : तम्बाकू हर रूप में है खतरनाक और संक्रमण का खतरा भी बढ़ाता है
Q-1) मैं स्मोकिंग करता हूं, क्या मुझे कोरोना का गंभीर संक्रमण हो सकता है? डब्ल्यूएचओ : स्मोकिंग और किसी भी रूप में तम्बाकू लेने पर सीधा असर फेफड़े के काम करने की क्षमता पर पड़ता है और सांस लेने से जुड़ी बीमारियां बढ़ती हैं। संक्रमण होने पर कोरोना सबसे पहले फेफड़े पर अटैक करता है, इसलिए इसका मजबूत होना बेहद जरूरी है। वायरस फेफड़े की कार्यक्षमता को घटाता है। अब तक कि रिसर्च के मुताबिक धूम्रपान करने वाले लोगों में वायरस का संक्रमण और मौत दोनों का खतरा ज्यादा है।
Q-2) मैं स्मोकिंग नहीं करता सिर्फ तम्बाकू लेता हूं तो संक्रमण का कितना खतरा है? डब्ल्यूएचओ : यह आदत आपके और दूसरे, दोनों के लिए खतरनाक है। तम्बाकू लेने के दौरान हाथ मुंह को छूता है। यह भी संक्रमण का जरिया है और कोरोना हाथ के जरिए मुंह तक पहुंच सकता है। या हाथों में मौजूद कोरोना तम्बाकू में जाकर मुंह तक पहुंच सकता है। तम्बाकू चबाने के दौरान मुंह में अतिरिक्त लार बनती है, ऐसे में जब इंसान थूकता है तो संक्रमण दूसरों तक पहुंच सकता है। इतना ही नहीं, इससे मुंह, जीभ, होंठ और जबड़ों का कैंसर भी हो सकता है।
Q-3) स्मोकिंग के अलग-अलग तरीकों से कैसे कोविड-19 का खतरा कितना बढ़ता है? डब्ल्यूएचओ : सिगरेट, सिगार, बीड़ी, वाटरपाइप और हुक्का पीने वाले कोविड-19 का रिस्क ज्यादा है। सिगरेट पीने के दौरान हाथ और होंठ का इस्तेमाल होता है और संक्रमण का खतरा रहता है। एक ही हुक्का को कई लोग इस्तेमाल करते हैं जो कोरोना का संक्रमण सीधेतौर पर एक से दूसरे इंसान में पहुंचा जा सकता है।
Q-4) स्मोकिंग या धूम्रपान छोड़ने पर शरीर में कितना बदलाव आता है? डब्ल्यूएचओ : इससे छोड़ने के 20 मिनट के अंदर बढ़ी हुई हृदय की धड़कन और ब्लड प्रेशर सामान्य होने लगता है। 12 मिनटबाद शरीर के रक्त में मौजूद कार्बन मोनो ऑक्साइड का स्तर घटने लगता है। 2 से 12 हफ्तों के अंदर फेफड़ों के काम करने की हालत में सुधार होता है। 1 से 9 माह के अंदर खांसी और सांस लेने में होने वाली तकलीफ कम हो जाती है।
कितना दम घोट रहा तम्बाकू
तम्बाकू से दुनियाभर में हर साल 80 लाख से अधिक लोगों की मौत हो रही है। इनमें 70 लाख मौत सीधेतौर पर तम्बाकू लेने वालों की हो रही हैं और दुनिया छोड़ने वाले करीब 12 लाख ऐसे लोग हैं जो धूम्रपान करने वालों के आसपास होने के कारण प्रभावित हुए।
बीमार और स्वस्थ फेफड़ों के बीच फर्क बताता यह वीडियो आपको अलर्ट रखने के लिए काफी है
चीन मेंबायोटेक कम्पनी सिनोवेट ने कोरोनावायरस की वैक्सीन बनाने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुकीहै, लेकिन उसे ट्रायल के लिए मरीज नहीं मिल रहे हैं। कम्पनी का दावा है कि उसका वैक्सीन99 फीसदी तकअसरदार साबित होगा। बायोटेक कम्पनी सिनोवेट का कहना है कि हमने वैक्सीन के 100 मिलियन डोज तैयार करने का लक्ष्य रखा है।
वैक्सीन का नाम रखा कोरोनावेक
एकेडमिक जर्नल साइंस में प्रकाशित शोध के मुताबिक, कम्पनी ने वैक्सीन का नाम "कोरोनावेक" रखा है। ट्रायल में पाया गया है कियह बंदर को कोरोनावायरस से सुरक्षित रखती है। शोधकर्ता का कहना है कि अगले दौर के ट्रायल के लिए चीन में कोविड-19 के मरीजों की संख्या काकम होना सबसे बड़ी समस्या है।
तीसरे दौर के ट्रायल के लिए ब्रिटेन से बातचीत जारी
कम्पनी अपने दूसरे दौर का ट्रायल कर रही है जिसमें 1 हजार वॉलंटियरोंको शामिल किया गया है। वैक्सीन का तीसरा ट्रायल ब्रिटेन में किया जाना है और इसके लिए बातचीत चल रही है। शोधकर्ता लुओ बायशन का कहना है कि मैं 99 फीसदी तक निश्चिंत हूं कि ये वैक्सीन कारगर साबित होगी।
तस्वीर बायोटेक कम्पनी सिनोवेट के लैब की है जहां दूसरे चरण का ट्रायल चल रहा है।
हाई रिस्क जोन वालों को प्राथमिकता
कम्पनी के सीनियर डायरेक्टर हेलेन येंग का कहना है कि हम तीसरे दौर के ट्रायल के लिए ब्रिटेन और यूरोपीय देश से बातचीत कर रहे हैं। अभी यह शुरुआती दौर में है। वैक्सीन के प्रोडक्शन से पहले रिसर्च पूरी होना बेहद जरूरी है। इसके ट्रायल में सफल होने पर अप्रूवल के बाद सबसे पहले उन्हें दी जाएगी, जो हाई रिस्क जोन में हैं।
इधर, ऑक्सफोर्ड ब्रिटेन को पहले वैक्सीन देने की तैयारी में
दुनियाभर के वैज्ञानिक वैक्सीन तैयार करने की रेस में हैं। वैक्सीन तैयार होने के बाद भी सभी देशों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है, बड़े स्तर पर इसे तैयार करना और उपलब्ध कराना। देश अपनी ही जनसंख्या में कैसे वैक्सीन देने की प्राथमिकता तय करेंगे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर वैक्सीन तैयार कर रही ड्रग कम्पनी एस्ट्राजेने का का कहना है कि ब्रिटेन पहला देश होगा, जिसे सबसे पहले हमारी वैक्सीन मिलेगी।
अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एपलाइड फिजिक्स लेबोरेटरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक जेर्ड इवांस कहते हैं कि अभी यह पता नहीं कि सीमित बारिश का असर वायरस पर क्या होगा। हालांकि, अधिकांश विशेषज्ञ यह मानते हैं कि बारिश में नमी के कारण वायरस तीव्र हो जाता है, जिससे बारिश में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
हालांकि, वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के ग्लोबल हेल्थ, मेडिसिन और एपिडिमियोलॉजी के प्रोफेसर जेर्ड बेटेन कहते हैं कि बारिश कोरोनावायरस को डायल्यूट (घोलकर कमजोर कर देना) कर सकती है। जिस तरह धूल बारिश के पानी में घुलकर बह जाती है, ठीक वैसे ही यह कोरोनावायरस भी बह सकता है। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश साबुन के पानी की तरह सतह को डिसइंफेक्ट करने में सक्षम नहीं है।
बारिश और कोरोना से जुड़े दो अहम सवाल
क्या बारिश से वायरस साफ नहीं हो सकते हैं?
यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के मुताबिक, ऐसे मामले भी आए हैं जिनमें 17 दिनों के बाद भी सतह पर कोरोना वायरस पाया गया है। ऐसे में फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता है कि बारिश से किसी सतह, मैदान या कुर्सी पर लगा वायरस साफ हो जाएगा। इसलिए बारिश में अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।
क्या बारिश से कोरोनावायरस धीमा भी नहीं पड़ेगा?
यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर की एपिडिमियोलॉजी डिपार्टमेंट की संस्थापक और वैज्ञानिक जेनिफर होर्ने के मुताबिक, बारिश का पानी वायरस की सफाई नहीं कर सकता है। इससे वायरस फैलने-पनपने की रफ्तार भी धीमी नहीं होगी। यह उसी तरह है कि हाथ पानी से धोएंगे तो वायरस नहीं मरेगा, साबुन लगाना पड़ेगा।
भारतीय विशेषज्ञ भी बोले- वायरस की सक्रियता बढ़ेगी
ये तीन तथ्य जो बताते हैं कि बारिश में सावधानी बढ़ानी पड़ेगी
वायरस देर तक रहता है: एम्स के कम्यूनिटी मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. संजय राय का कहना है कि बारिश और कोरोना पर अध्ययन नहीं हुआ है। लेकिन, वायरस की सक्रियता में कमी नहीं बल्कि तीव्रता और बढ़ेगी। बारिश में तापमान और आद्रता किसी भी वायरस के फैलने और अधिक देर तक रहने में मददगार होती है।
जहां बारिश वहां भी मामले आए: आईसीएमआर की ओर से कोविड-19 के लिए बनाई गई रिसर्च और ऑपरेशन टीम के सदस्य को-एपिडेमोलॉजिस्ट प्रो.डॉ.नरेंद्र अरोड़ा कहते हैं कि बारिश में कोरोना कम होगा इसकी संभावना नहीं है। इंडोनेशिया और सिंगापुर में पूरे वर्ष बारिश होती है, लेकिन वहां लगातार मामले आ रहे हैं।
अस्पताल पर बोझ बढ़ेगा: राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के डॉ.एसी धारीवाल कहते हैं कि बारिश के मौसम में डेंगू, चिकनगुनिया, सामान्य फ्लू वाले मरीजों की संख्या भी बढ़ेगी, यह एक अलग परेशानी है। ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती होंगे तो संक्रमण का खतरा भी ज्यादा होगा।
अमेरिका में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित न्यूयॉर्क सिटी में 8 जून से लॉकडाउन खुल जाएगा। करीब 4 लाख कर्मचारी 83 दिन के बाद काम पर लौट सकेंगे। न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू क्यूमो ने इसकी घोषणा की है। न्यूयॉर्क सिटी 15 मार्च से बंद है। इस महीने की शुरुआत में न्यूयॉर्क राज्य के ज्यादातर क्षेत्रों में लॉकडाउन में ढील दी गई थी, लेकिन न्यूयॉर्क सिटी में नहीं दी गई थी।
गवर्नर क्यूमो ने कहा है कि न्यूयॉर्क सिटी में अलग-अलग चरणों में लॉकडाउन में ढील दी जाएगी। पहले चरण में निर्माण कार्य, उत्पादन और माल की थोक आपूर्ति की अनुमति दी जा रही है। लोग कृषि, वानिकी और मछली पालन के कार्य दोबारा शुरू कर सकेंगे। न्यूयॉर्क के अन्य 5 क्षेत्र लॉकडाउन में छूट के दूसरे चरण में खोले जाएंगे।
इसके तहत रियल एस्टेट सर्विस, खुदरा दुकानें और कुछ हेयर सैलून खोलने की अनुमति होगी। अमेरिका में 17.99 लाख से ज्यादा मरीज और एक लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं। न्यूयॉर्क सिटी में 1.99 लाख केस और 20,000 मौतें हुई हैं।
टकराव: अमेरिका ने चीनी छात्रों को आने से रोका; चीन बोला- यह नस्लवाद है
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंध रखने वाले चीनी छात्रों और शोधकर्ताओं के देश में प्रवेश पर रोक लगाने की घोषणा की है। ट्रम्प ने कहा कि चीन अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के आधुनिकीकरण के लिए संवदेनशील अमेरिकी टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा को हासिल करने का अभियान चला रहा है।
यह स्थिति अमेरिका के लिए जोखिम भरी है। इस मामले पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने कहा कि अमेरिका शीत युद्ध की योजना बना रहा है। अमेरिका चीनी छात्रों के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन न करे। वह नस्लवादी रुख न अपनाए।
यूरोप: पर्यटन उद्योग बचाने के लिए बॉर्डर खोलने की तैयारी
यूरोपीय देशों में ऑफिस, रेस्तरां और कुछ उद्योग खुल चुके हैं। अब इन देशों की सरकारें पर्यटन उद्योगों को बचाने की योजना बना रही है। इसके लिए ये देश बॉर्डर खोलने की तैयारी कर रहे हैं, खासकर शेंगेन क्षेत्र के देश। इस क्षेत्र में 26 देश हैं। इस क्षेत्र में शामिल देशों के लोगों को यहां घरेलू यात्रा की तरह आवागमन की अनुमति है।
यह लक्जमबर्ग के शेंगेन शहर में 1985 में हुए समझौते का हिस्सा है। बॉर्डर खोलने के लिए यूरोपीय अधिकारी नई गाइडलाइंस तैयार कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि सब ठीक रहा तो बुल्गारिया, सर्बिया की सीमाएं 1 जून से खुल जाएंगी। वहीं ग्रीस ने यूरोपीय देशों समेत 29 देशों की सूची तैयार की है।
इन देशों के लिए ग्रीस 15 जून से खुल सकता है। चेक रिपब्लिक, हंगरी, स्लोवाकिया भी इसी तरह की तैयारियां कर रहे हैं। फ्रांस, जर्मनी और पश्चिमी यूरोप के अन्य देश आपस में इस मसले पर बात कर रहे हैं। ये भी 15 जून से बॉर्डर खोल सकते हैं।
चर्च खुल रहे, अब कारोबार खुलने को तैयार...
न्यूयॉर्क सिटी का सेंट मेल चर्च खुल गया है, लेकिन यहां 10 से ज्यादा लोग एक साथ जमा नहीं हो सकते। अब शहर में जल्द ही कारोबार भी खुलने वाला है।
अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एपलाइड फिजिक्स लेबोरेटरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक जेर्ड इवांस कहते हैं कि अभी यह पता नहीं कि सीमित बारिश का असर वायरस पर क्या होगा। हालांकि, अधिकांश विशेषज्ञ यह मानते हैं कि बारिश में नमी के कारण वायरस तीव्र हो जाता है, जिससे बारिश में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
हालांकि, वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के ग्लोबल हेल्थ, मेडिसिन और एपिडिमियोलॉजी के प्रोफेसर जेर्ड बेटेन कहते हैं कि बारिश कोरोनावायरस को डायल्यूट (घोलकर कमजोर कर देना) कर सकती है। जिस तरह धूल बारिश के पानी में घुलकर बह जाती है, ठीक वैसे ही यह कोरोनावायरस भी बह सकता है। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश साबुन के पानी की तरह सतह को डिसइंफेक्ट करने में सक्षम नहीं है।
बारिश और कोरोना से जुड़े दो अहम सवाल
क्या बारिश से वायरस साफ नहीं हो सकते हैं?
यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के मुताबिक, ऐसे मामले भी आए हैं जिनमें 17 दिनों के बाद भी सतह पर कोरोना वायरस पाया गया है। ऐसे में फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता है कि बारिश से किसी सतह, मैदान या कुर्सी पर लगा वायरस साफ हो जाएगा। इसलिए बारिश में अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।
क्या बारिश से कोरोनावायरस धीमा भी नहीं पड़ेगा?
यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर की एपिडिमियोलॉजी डिपार्टमेंट की संस्थापक और वैज्ञानिक जेनिफर होर्ने के मुताबिक, बारिश का पानी वायरस की सफाई नहीं कर सकता है। इससे वायरस फैलने-पनपने की रफ्तार भी धीमी नहीं होगी। यह उसी तरह है कि हाथ पानी से धोएंगे तो वायरस नहीं मरेगा, साबुन लगाना पड़ेगा।
भारतीय विशेषज्ञ भी बोले- वायरस की सक्रियता बढ़ेगी
ये तीन तथ्य जो बताते हैं कि बारिश में सावधानी बढ़ानी पड़ेगी
वायरस देर तक रहता है: एम्स के कम्यूनिटी मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. संजय राय का कहना है कि बारिश और कोरोना पर अध्ययन नहीं हुआ है। लेकिन, वायरस की सक्रियता में कमी नहीं बल्कि तीव्रता और बढ़ेगी। बारिश में तापमान और आद्रता किसी भी वायरस के फैलने और अधिक देर तक रहने में मददगार होती है।
जहां बारिश वहां भी मामले आए: आईसीएमआर की ओर से कोविड-19 के लिए बनाई गई रिसर्च और ऑपरेशन टीम के सदस्य को-एपिडेमोलॉजिस्ट प्रो.डॉ.नरेंद्र अरोड़ा कहते हैं कि बारिश में कोरोना कम होगा इसकी संभावना नहीं है। इंडोनेशिया और सिंगापुर में पूरे वर्ष बारिश होती है, लेकिन वहां लगातार मामले आ रहे हैं।
अस्पताल पर बोझ बढ़ेगा: राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के डॉ.एसी धारीवाल कहते हैं कि बारिश के मौसम में डेंगू, चिकनगुनिया, सामान्य फ्लू वाले मरीजों की संख्या भी बढ़ेगी, यह एक अलग परेशानी है। ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती होंगे तो संक्रमण का खतरा भी ज्यादा होगा।
अमेरिका में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित न्यूयॉर्क सिटी में 8 जून से लॉकडाउन खुल जाएगा। करीब 4 लाख कर्मचारी 83 दिन के बाद काम पर लौट सकेंगे। न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू क्यूमो ने इसकी घोषणा की है। न्यूयॉर्क सिटी 15 मार्च से बंद है। इस महीने की शुरुआत में न्यूयॉर्क राज्य के ज्यादातर क्षेत्रों में लॉकडाउन में ढील दी गई थी, लेकिन न्यूयॉर्क सिटी में नहीं दी गई थी।
गवर्नर क्यूमो ने कहा है कि न्यूयॉर्क सिटी में अलग-अलग चरणों में लॉकडाउन में ढील दी जाएगी। पहले चरण में निर्माण कार्य, उत्पादन और माल की थोक आपूर्ति की अनुमति दी जा रही है। लोग कृषि, वानिकी और मछली पालन के कार्य दोबारा शुरू कर सकेंगे। न्यूयॉर्क के अन्य 5 क्षेत्र लॉकडाउन में छूट के दूसरे चरण में खोले जाएंगे।
इसके तहत रियल एस्टेट सर्विस, खुदरा दुकानें और कुछ हेयर सैलून खोलने की अनुमति होगी। अमेरिका में 17.99 लाख से ज्यादा मरीज और एक लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं। न्यूयॉर्क सिटी में 1.99 लाख केस और 20,000 मौतें हुई हैं।
टकराव: अमेरिका ने चीनी छात्रों को आने से रोका; चीन बोला- यह नस्लवाद है
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंध रखने वाले चीनी छात्रों और शोधकर्ताओं के देश में प्रवेश पर रोक लगाने की घोषणा की है। ट्रम्प ने कहा कि चीन अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के आधुनिकीकरण के लिए संवदेनशील अमेरिकी टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा को हासिल करने का अभियान चला रहा है।
यह स्थिति अमेरिका के लिए जोखिम भरी है। इस मामले पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने कहा कि अमेरिका शीत युद्ध की योजना बना रहा है। अमेरिका चीनी छात्रों के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन न करे। वह नस्लवादी रुख न अपनाए।
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा है कि प्रदेश सरकार प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के साथ अन्याय कर रही है। शनिवार को उन्होंने ट्वीट कर कहा कि उनके संघर्ष को मैंने नजदीक से देखा है। वह...
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कोरोना संक्रमण के चलते दुनिया पर मंडराते मौत के साये के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि धूम्रपान करने वालों को यह बीमारी होने का जोखिम अधिक रहता है और बीमारी की चपेट में आने पर उन्हें सघन...
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कोरोना से निपटने के लिए अलग-अलग सरकारों की तैयारियों को ट्रैक करने वाले ऑक्सफोर्ड कोविड-19 गवर्मेंट रिस्पॉन्स ट्रैकर ने अप्रैल में भारत को 100 में से 100 पॉइंट्स दिए थे। महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए टोटल लॉकडाउन ने भारत को कोरोना से निपटने की तैयारियों में अमेरिका, इटली समेत कई विकसित देशों से आगे रखा था। डब्लूएचओ ने भी भारत के जल्दी लॉकडाउन के फैसले की तारीफ की थी। लेकिन इसके बाद क्या हुआ?
भारत अब कोरोना के सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की लिस्ट में 9वें स्थान पर है। अमेरिका और ब्राजील के बाद अब भारत में ही कोरोना के सबसे ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं। पिछले 2 दिनों से हर दिन 7 हजार से ज्यादा संक्रमित मिल रहे हैं।
जबकि जिन यूरोपीय देशों में पहले हर दिन 7-7 हजार से ज्यादा मामले मिल रहे थे वहां इनकी संख्या 10 गुना तक कम हो गई है। मोदी सरकार के इस महामारी से लड़ने के अपने जो भी दावे हों लेकिन ये आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि मोदी सरकार ने कोरोना की रोकथाम में जो शुरुआती बढ़त हासिल की थी, अब वोखो गईहै।
कोरोना से लड़ाई में पिछड़ी मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकालके पहले साल में कई और मामलों में भी पीछे रही है। ऐसे ही 9 और मामलों पर एक रिपोर्ट..
1. पड़ोसी देश: हमेशा साथ देने वाला नेपाल भी अब आंख दिखा रहा
नेपाल.. भारत और चीन दोनों का पड़ोसी देश है। दोनों ही देश इसे अपने पक्ष में करने के लिए अपनी-अपनी विदेश नीतियों में उसे हमेशा से तरजीह देते रहे हैं। भारत के नेपाल के साथ संबंध हमेशा अच्छे ही रहे हैं लेकिन हाल ही में लिपुलेख को लेकर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद शुरू हो गया है।
लिपुलेख भारत, नेपाल और चीन की सीमा से लगता है। भारत इस इलाके को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है और नेपाल इसे अपना हिस्सा बताता है। नेपाल का भारत से विवाद होनाचीन के खिलाफ रणनीतिक दृष्टि से एक खास साथी को खोने जैसा है।
2015 में नेपाल में मधेसी आंदोलन के दौरान भी भारत और नेपाल के बीच संबंधों में खटास आई थी। भारत से नेपाल होने वाला निर्यात बॉर्डर पर रोक लिया गया था।
इस समय चीन के साथ भी भारत के संबंध ज्यादा बेहतर नहीं है। इसी महीने पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे और सिक्किम के नाकू ला सेक्टर में भारत-चीन के सैनिकों के बीच टकराव जैसी स्थिति बनी।इसके बाद किसी देश का नाम लिए बिना चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सेना को तैयार रहने के निर्देश दिए थे।
यानी साल 2017 में 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन के रिश्तों में सुधार लाने में दोनों ही देशों की सरकार कुछ खास नहीं कर पाई। उधर, 2008 मुंबई अटैक के बाद से ही पाकिस्तान से हमारे रिश्ते नहीं सुधर पाए हैं। पहले कार्यकाल में हुआ मोदी का पाकिस्तानी दौरा भी कुछ खास बदलाव न ला सका था।
2. विदेश नीति: पहले कार्यकाल में पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदमों पर दुनियाभर के देशों का साथ मिला था लेकिन इस बार आर्टिकल 370 और सीएए पर भारत की आलोचना हुई
आर्टिकल 370 हटने के बावजूद कश्मीर में कोई बड़ी हिंसा या आंदोलन नहीं होने देना मोदी सरकार की कामयाबी रही लेकिन, विदेश नीति के तौर पर इस कदम से कश्मीर मुद्दे का कुछ हद अंतरराष्ट्रीयकरण भी हुआ जो भारत सरकार कभी नहीं चाहती थी।
जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने कश्मीर के हालात काबू से बाहर बताए थे। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प कई बार मध्यस्थता कराने की पहल कर रहे थे। यूरोपीयन संसद में भी 370 के हटने पर चर्चा हुई थी।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 16 अगस्त 2019 को कश्मीर मुद्दे पर चर्चा हुई। 1965 के बाद 55 सालों में यह पहली बार था, जब यूएनएससी में कश्मीर पर बैठक रखी गई।
दिसंबर में नागरिकता संशोधन बिल लाने के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण भी मोदी सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने सीएए को भेदभावपूर्ण बताया था। यूएन महासचिव एंटोनियो गुतरेज ने इस बिल के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को बलपूर्वक बंद करवाने के सरकार के रवैये पर भी चिंता जाहिर की थी। मलेशिया, टर्की, कुवैत, अफगानिस्तान जैसे कई देशों ने सीएए के प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा पर चिंता जताई थी।
3. दिल्ली दंगे: हिंसा में दंगाइयों के साथ पुलिस के दिखने से गृहमंत्रालय की विश्वसनीयता पर सवाल उठा
दिल्ली चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं ने सीएए के खिलाफप्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ कई उकसावे वाले बयान दिए थे। चुनाव के बाद भी ये जारी रहे। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी 23 फरवरी को ऐसा ही उकसावे वाला बयान दिया। इसके अगले दिन ही दिल्ली में दंगे भड़क गए।
1984 के सिख दंगों के 36 साल बाद देश की राजधानी में इतने बड़े स्तर पर दंगे हो रहे थे। तीन दिनों तक हिंसा होती रही। कई तस्वीरों में तो गृहमंत्रालय के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस दंगाइयों के साथ पत्थर फेंकते नजर आई। इस हिंसा में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।
खास बात यह कि जब दिल्ली में हिंसा भड़की थी तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भारत दौरे पर थे। ऐसे में विदेशी मीडिया ने ट्रम्प के दौरे के दौरान भड़के इन दंगों को प्रमुखता से छापा। इंटरनेशनल मीडिया में मोदी सरकार पर दंगों पर समय रहते काबू न करने के लिए आलोचना हुई।
4. धार्मिक असहिष्णुता : भारत की सेक्युलर छवि पर असर
अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आजादी आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने इस साल अप्रैल में अपनी रिपोर्ट में सीएए, एनआरसी, धर्मांतरण विरोधी कानून, मॉब लिंचिंग, जम्मू-कश्मीर से विशेष अधिकार छिनने, अयोध्या में राम मंदिर सुनवाई के दौरान भारत सरकार के एकतरफा रवैये जैसी कई चीजों के आधार पर भारत को धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाला देश बताया था।
कमीशन ने अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट को भारत को विशेष चिंताजनक स्थिति वाले देशों (सीपीसी) की लिस्ट में डालने का सुझाव दिया था। इसी कमीशन ने यह भी कहा था कि कोरोना के दौरान भारत में मुस्लिमों को बलि का बकरा बनाया गया।
मोदी के पहले कार्यकाल की तरह ही दूसरे कार्यकाल में भी मॉब लिंचिंग की घटनाएं जारी रहीं। झारखंड में जून 2019 में 24 साल के तबरेज अंसारी की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी।
ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2015 से दिसंबर 2019 तक गौमांस खाने और बेचने की शंका के आधार पर 50 लोगों की हत्या हुई। ऐसे ही हमलों में 250 लोग घायल भी हुए। यही नहीं मार्च में लॉकडाउन के बाद जब कोरोना के मामले बढ़ने लगे तोकेन्द्र सरकार ने इसका ठिकरा जमातियों पर फोड़ा।
असर यह हुआ कि गांवों में मुस्लिम व्यापारियों के प्रवेश पर पाबंदी लगने के पोस्टर चिपकाए गए। मुस्लिम फल-सब्जी बेचने वालों को गली-मोहल्लों से भगाया जाने लगा। ऐसी तमाम खबरें पिछले 2 महीने से देश के कोने-कोने से आती रही हैं। इन घटनाओं के कारण बाहर भारत की सेक्युलर छवि को नुकसान पहुंचा।
मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के एक गांव में मुस्लिम व्यापारियों के प्रवेश को लेकर एक पोस्टर लगाया गया था। इसमें लिखा गया था कि मुस्लिम व्यापारियों का गांव में प्रवेश निषेध है।
5. सीएए के खिलाफ तीन महीने से जारी प्रदर्शन कोरोना के कारण रूक पाए, सरकार ने कोई पहल नहीं की
नागरिकता संशोधन बिल जैसे ही संसद से पास हुआ, उसके अगले दिन से ही देशभर में इसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए थे। आईआईएम, आईआईटी जैसे संस्थानों समेत देशभर की कई यूनिवर्सिटियों के छात्र संगठन सड़कों पर उतरने लगे थे। धीरे-धीरे आमजन भी इसमें शामिल होते गए। शाहीन बाग सबसे बड़ा उदाहरण बना, जहां महिलाएं तीन महीनों तक 24 घंटे सड़कों पर बैठीं रहीं।
शाहीन बाग में 14 दिसंबर की रात से लॉकडाउन लगने तक (24 मार्च) महिलाओं का धरना जारी था।
इस तर्ज पर देशभर में कई जगह मुस्लिम महिलाओं ने शाहीन बाग बनाएं। यूपी में प्रदर्शन रोकने के लिए योगी सरकार ने जुर्माना लगाया। लेकिन, देशभर में कई जगहों पर यह प्रदर्शन जारी रहे। केन्द्र सरकार इन प्रदर्शनकारियों को विश्वास में नहीं ले पाई और न ही बातचीत के जरिए कोई हल निकाला जा सका। इतने लंबे समय तक और इतने बड़े स्तर पर हुए ये प्रदर्शन नई पीढ़ी ने पहले कभी नहीं देखे थे।
6. कोराना के पहले ही अर्थव्यवस्था गोते खा रही थी, नए रोजगार पैदा करने में भी सरकार फैल रही
2019-20 के दौरान जीडीपी ग्रोथ 4.2% रही। यह पिछले 11 सालों का न्यूनतम स्तर है। अब कोरोना के बाद तो इसका नेगेटिव जाने का अनुमान है। मोदी सरकार नए रोजगार भी नहीं ला पाई। मोदी के पिछले कार्यकाल में पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि देश में बेरोजगारी दर 45 सालों के सबसे उच्चतम स्तर पर है।
इसमें अब और इजाफा हो गया है। हाल ही में आई सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन के कारण महज अप्रैल महीने में 12 करोड़ भारतीयों को नौकरी गंवानी पड़ी है।
7. हेल्थ सेक्टर: मोदी हकीकत जानते थे इसलिए कोराना से बचाव के लिए बहुत पहले ही लॉकडाउन लगा दिया
देश में हेल्थ पर कुल जीडीपी का 2% से भी कम खर्च होता है। जबकि, अमेरिका में जीडीपी का 8.5% और जर्मनी में 9.4% खर्च हेल्थ पर किया जाता है। डब्लूएचओ के मुताबिक, हेल्थ पर जीडीपी का हिस्सा खर्च करने के मामले में 191 देशों में भारत 184 वें नम्बर पर आता है।
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले साल में भी इस सेक्टर में कुछ खास सुधार नहीं देखा गया। हालांकि, मोदी सरकार ने 25 सितंबर से शुरू हुई आयुष्मान भारत योजना के तहत देश के 10 करोड़ परिवारों या 50 करोड़ लोगों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराने की बात कही है, जो एक बड़ा कदम है।
8. महंगाई दर: दिसंबर में 7 सालों के उच्चतम स्तर पर थी
भारत में महंगाई दर मार्च 2019 के बाद से ही लगातार बढ़ रही है। मार्च 2019 में खाद्य पदार्थों की महंगाई दर 0.30% थी जो दिसंबर 2019 में 14.12% पर पहुंच गई थी। यह साल 2013 के बाद सबसे ज्यादा बढ़ोतरी थी। खुदरा महंगाई दर भी मार्च 2019 में 2.86% थी, वह मार्च 2020 में 5.54% पर पहुंच गई।
9. प्रेस की आजादी: हर साल लगातार भारत की रैंकिंग गिर रही
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 142 है। यह पिछले तीन सालों से लगातार गिर रही है। 2019 में यह 140 थी और 2018 में यह 138 थी। हाल ही में 11 मई को गुजरात के एक पत्रकार धवल पटेल को देशद्रोह का केस लगाकर जेल में बंद कर दिया गया है। उन्होंने 7 मई के एक आर्टिकल में लिखा था कि कोरोना की रोकथाम न कर पाने के कारण गुजरात सीएम विजय रुपाणी अपना पद खो सकते हैं।