अमेरिका में 14 साल पहले दो वैज्ञानिकों ने पहली बार बुश सरकार के सामने सोशल डिस्टेंसिंग नीति बनाने का प्रस्ताव रखा था, पर अधिकारियों ने खिल्ली उड़ा दी थी

एरिक लिप्टन और जेनिफर स्टीनहाऊर. कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित देश अमेरिका है। अब तक 60 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। यदि 14 साल पहले कुछ वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग कानून (फेडरल पॉलिसी) के प्रस्ताव को खारिज न किया जाता तो...इस मौत की त्रासदी को रोका जा सकता था।
ऐसा (उपरोक्त बातें) अमेरिका के दो वरिष्ठ सरकारी चिकित्सक डॉ. रिर्चड हैशे और डॉ. कार्टर मेकर का कहना है। वर्तमान में डॉ. हैशे कैंसर विशेषज्ञ सलाहकार के तौर व्हाइट हाउस में, जबकि डॉ. मेकर वेटरन्स अफेर्यस विभाग में एक चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। दोनों ने न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार से अमेरिका में सोशल डिस्टेंसिंग नीति के जन्म और उसके खारिज होने की कहानी को साझा किया।

पढ़िए डॉ. हैशे और डॉ. मेकर की जुबानी...सामाजिक दूरी के जन्म की अनकही कहानी...

  • अधिकारियों ने सोशल डिस्टेंसिंग नीति के प्रस्ताव की खिल्ली उड़ाई, कहा- घर में दुबकने से बेहतर है महामारी की दवा खोजी जाए

डॉ. मेकर कहते हैं कि यह करीब 14 साल पहले की बात होगी। मैं और डॉ. हैशे वॉशिंगटन के उपनगरीय स्थित एक बर्गर शॉप में अपने कुछ सहयोगियों के साथ मुलाकात करने गए। वह मुलाकात दरअसल उस (सोशल डिस्टेंसिंग) प्रस्ताव की अंतिम समीक्षा से जुड़ी थी, जिसमें यह तय किया जाना था कि अगली बार अमेरिका पर अगर किसी विनाशकारी महामारी का हमला होता है, तो लोग सामाजिक दूरी बनाएंगे और घर से ही काम करेंगे। जब हमने यह प्रस्ताव पेश किया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने न सिर्फ इसे शक की नजर से देखा, बल्कि इस प्रस्ताव की खिल्ली भी उड़ाई। अन्य अमेरिकियों की तरह समीक्षा करने आए अधिकारियों ने भी दवा उद्योग के प्रति आश्वस्त दिखे। उनका जोर किसी भी महामारी से बचने के लिए घरों में दुबक कर बैठ जाने से बेहतर स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करते हुए इलाज के नए तरीके ईजाद करने पर था।

  • किसी भी महामारी से बचने का सबसे अच्छा इलाज सोशल डिस्टेंसिंग है, लेकिन इसे अव्यावहारिक और गैर जरूरी बताया गया

डॉ. हैशे कहते हैं कि कोरोना वायरस पूरे विश्व के लिए बिल्कुल नया है। ये कहां से आया है? कैसे रुकेगा? इसका इलाज क्या है? किसी के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है। लेकिन एक बात सौ फीसद सही साबित हो गई है कि इसे सोशल डिस्टेंसिंग से ही रोका जा सकता है। जिन देशों में इस पर थोड़ा या ज्यादा काबू पाया गया है, वहां पर यही हथियार अपनाया गया है। किसी भी महामारी से बचने का सबसे अच्छा इलाज सोशल डिस्टेंसिंग ही है। इसमें जान जाने की दर बहुत कम होती है। मैं और डॉ. मेकर इसी बात पर जोर दे रहे थे। जिस सोशल डिस्टेंसिंग से लोग आज परिचित हैं या फिर हो रहे हैं, दरअसल इसे मध्यकाल से ही में अपनाया जा रहा है। 2006-07 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की पहल पर हमने एक प्रस्ताव रखा था कि देश में अगली संक्रामिक बीमारी से मुकाबला करने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता, लेकिन संघीय नौकरशाहों ने तब इसे अव्यावहारिक, गैर जरूरी और राजनीतिक रूप से असंभव (नॉन फिजिबल) कहकर नकार दिया था।

  • दोस्त डॉ. ग्लास की 14 वर्षीय बेटी ने स्कूल में सोशल डिस्टेंसिंग पर बनाया था साइंस प्रोजेक्ट उसी से मिला आइडिया

डॉ. मेकर कहते हैं कि इनफ्लुएंजा के नए प्रकोप और टेमीफ्लू जैसी दवा के सभी संक्रामक बीमारियों में कारगर न होने की सच्चाई को देखते हुए डॉ. हैशे और मैं अपनी टीम के साथ बड़े पैमाने के संक्रमण का मुकाबला करने के लिए अन्य तरीके की खोज में लगे हुए थे। उसी दौरान न्यू मैक्सिको स्थित सैंडिया नेशनल लेबोरेट्री में वरिष्ठ वैज्ञानिक रॉबर्ट ग्लास जो कि मेरे अच्छे दोस्त भी हैं, उनसे इस बारे में बात हुई। ग्लास की 14 साल की बेटी लॉरा ने अपने अल्बुकर्क हाईस्कूल में सोशल नेटवर्क का एक प्रोजेक्ट बनाया था। जब डॉ. ग्लास ने उसे देखा, तो उनकी जिज्ञासा अचानक बढ़ गई थी। प्रोजेक्ट के अनुसार स्कूली बच्चे जो कि सामाजिक तानेबाने और स्कूल बसों और कक्षाओं में एक साथ इतनी बारीकी से जुड़े रहते हैं कि महामारी के दौरान वे एक दूसरे के लए संक्रामक फैलाने के परिपूर्ण संवाहक (कंप्लीट कैरिअर) बन सकते हैं। डॉ. ग्लास ने अपनी बेटी के इस प्रोजेक्ट के माध्यम से यह पता लगाया कि इस आपसी जुड़ाव को तोड़कर ही संक्रामिक बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है। उनका अध्ययन चौंकाने वाला था। 10 हजार की आबादी वाले शहर के स्कूलों को बंद करने से सिर्फ 500 लोग संक्रमित हो सकते थे, जबकि सारे स्कूलों को खुला रखने से शहर की आधी आबादी संक्रमित होती। मुझे जब इस अध्ययन का पता चला, तो मैं चकित हो गया। डॉ. हैशे के साथ मैंने क्लास रूम और स्कूल बसों में छात्रों के बीच की दूरी (कम से कम एक मीटर) के बारे में जाना। हमने किसी भी महामारी में नुकसान को कम करने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को किस तरह और किस समय लागू किया जाना चाहिए? इस बारे में गहन चर्चा की। वास्तव में यदि डॉ. ग्लास से बात न होती और उनकी बेटी ने अगर प्रोजेक्ट न बनाया होता तो हम सोशल डिस्टेंसिंग प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार न कर पाते।

  • 2001 में बुश ने जान बेरी की किताब ‘द ग्रेट इन्फ्लुएंजा’ पढ़ी थी, जो 1918 के स्पैनिश फ्लू पर केंद्रित थी, इसके बाद वे ठोस नीति बनाना चाहते थे

डॉ. हैशे कहते हैं कि दरअसल, सोशल डिस्टेंसिंग पर जोर देने की जार्ज बुश की कवायद 2005 की गर्मी में शुरू हुई थी। 2001 में अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद वैश्विक आतंकवाद के प्रति आशंकित बुश ने उसी दौरान जान बेरी की किताब ‘द ग्रेट इन्फ्लुएंजा’ पढ़ी, जो 1918 के स्पैनिश फ्लू पर केंद्रित थी। उसी साल विएतनाम में बर्ड फ्लू समेत कई संक्रामिक बीमारियों ने उनकी आशंका को और बढ़ा दी, जिनमें पक्षियों और पशुओं से मनुष्य संक्रमित हो रहे थे। बुश चाहते थे कि किसी भी महामारी से बचने के लिए अमेरिका के पास ठोस रणनीति हो। 2005 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के एक कार्यक्रम में उन्होंने इस पर विस्तार से चर्चा भी की थी। उनके प्रशासन में सोशल डिस्टेंसिंग की धारणा को प्रोत्साहित किया गया। बराक ओबामा प्रशासन ने पांच साल तक इसकी समीक्षा करने के बाद 2017 में इसका डॉक्यूमेंटेशन (दस्तावेजीकरण) किया, लेकिन मौजूदा डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस पर गौर नहीं किया। खुद ट्रंप द्वारा कोविड-19 के खतरे को कम करके आंकने और उनकी सरकार द्वारा वायरस की चेतावनी की अनसुनी करने के कारण जब खतरा बहुत अधिक बढ़ गया, और संक्रमण तथा मौत के मामले बढ़ने लगे, तब ट्रंप ने राज्यों को लॉकडाउन (सोशल डिस्टेंसिंग का एक प्रारूप) के लिए प्रोत्साहित किया। 14 साल पहले यदि हमें ‘शटअप’ न किया गया होता जो कि अपमानित करने के लिए बहुत भद्दा शब्द है। तो शायद आज अमेरिका में सोशल डिस्टेंसिंग फेडरल पॉलिसी का रूप ले चुका होता और इसे किसी भी महामारी के दौरान लागू करना लाजमी होता।



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तस्वीर 2005 की है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।


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एंबुलेंस बुक करा दि्ल्ली से 4 लोग पहुंच गए सुपौल, पुलिस ने कराया क्वारेंटाइन

दिल्ली से एम्बुलेंस बुक कराकर बुधवार की सुबह चार लोग सदर थाना क्षेत्र के झखराही पहुंचा। एम्बुलेंस चालक इन्हें उतारते ही भाग खड़ा हुआ। परिवार के मुखिया का इलाज गुड़गांव के मेदांता में चल रहा था। इसकी...

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46% लोग भीड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे, 51% को हेल्थकेयर सुधरने की उम्मीद: रिपोर्ट

कोरोना संकट के चलते लॉकडाउन की वजह से दुनिया में करीब 400 करोड़ लोग अपने घरों में कैद हैं। 31 लाख से ज्यादा मरीज और दो लाख से ज्यादा मौतेंहोने के बावजूद अभी तक कोरोना का कोई वैक्सीन या इलाज नहीं खोजा जा सका है। ऐसे में लॉकडाउन कब और कैसे खुलेगा, इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं।

इसी मामले परग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा ने कोविड-19 बैरोमीटर जारी किया है। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की गई है कि कोरोना संकट के बाद हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा, रोजमर्रा की जिंदगी में क्या-क्या बदलाव आ सकते हैं। 49 फीसदी लोगों ने कहा है कि वे भीड़भाड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे। 51 फीसदी ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद जताई है।

बैरोमीटर अमेरिका को ध्यान में रखकर बनाया गया

रिपोर्ट के मुताबिक, यह बैरोमीटर अमेरिका को ध्यान में रखकर बनाया गया है, लेकिन इसे वैश्विक स्तर यानी दुनिया परभी लागू किया जा सकता है। 10 में 4 लोगों को उम्मीद है कि कोरोना संकट के बाद वर्क फ्रॉम होम का चलन बढ़ेगा। 50% लोगों ने कहा कि वे जब भी बाहर जाएंगे, तो बिना मास्क के नहीं जाएंगे।



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ग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा ने कोविड-19 बैरोमीटर जारी किया है। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की गई है कि कोरोना संकट के बाद हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा।


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बिहार में व्यावसायिक वाहन को टैक्स जमा करने में राहत, जानें राज्य कैबिनेट की बैठक में लिए 5 बड़े फैसले

राज्य सरकार ने सभी व्यावसायिक वाहनों को बकाया टैक्स जमा करने में राहत दी है। कॉमर्शियल वाहन मालिक बकाया टैक्स 30 जून तक जमा करा सकेंगे। 30 जून तक टैक्स जमा करने में किसी तरह का जुर्माना नहीं लगेगा।...

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डॉक्टर ने अपने समर्पण से कई कोरोना पीड़ितों को ठीक किया, दूसरों का दर्द देखा नहीं जाता था, आखिर में जान दे दी

(अली वाटकिंस, माइकल रोथफेल्ड)अमेरिका में कई काेरोना वायरस मरीजों का इलाज कर चुकी एक डॉक्टर ने जान दे दी। मरीजों का इलाज करते-करते वो खुद इनफेक्टेड हो गईं थीं। डॉक्टर लोर्ना एम ब्रीन की मौत दरअसल,डाॅक्टरों पर कोराेना के मानसिक असर को सामने ले आई है। डॉक्टर ब्रीन न्यूयॉर्क के प्रेस्बिटेरियन एलन अस्पताल में इमरजेंसी डिपार्टमेंट की मेडिकल डायरेक्टर थीं। 200 बेड के इस अस्पताल में 170 कोरोना पीड़ित मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

डॉक्टर लोर्नाकाे कोई मानसिक बीमारी नहीं थी

डॉ ब्रीन के पिता डॉ फिलिप ने बताया कि लोर्ना ने कोरोना मरीजों के डरावने मंजर देखे। वो अपना काम पूरी लगन से कर रही थीं। कोरोना संक्रमण से ठीक होकर वह घर तो आ गईं, लेकिन कुछ दिनों बाद वापस अस्पताल जाने लगीं। फिर हमने उन्हें रोका और उसे चार्लोट्सविले ले आए। 49 साल की लोर्ना काे कोई मानसिक बीमारी नहीं थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि कुछ अजीब और अलग लग रहा है। वो निराश लग रहीं थीं। मुझे ऐसा लगा कि कुछ गलत हो रहा है। उन्होंनेमुझे बताया था कि मरीज अस्पताल के सामने एम्बुलेंस से उतारने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं।

अस्पताल ने कहा- डॉ लोर्नाअसली हीरो
डॉक्टर लोर्ना कोरोनावायरस से लड़ रहे लोगों की अग्रिम पंक्ति में थीं। अस्पताल ने डॉ ब्रीन को एक असली हीरो बताया है। अस्पताल ने बयान में कहा-डॉ. लोर्ना ने बेहद मुश्किल वक्त पर लोगों का इलाज करते हुए उच्चतम आदर्शों का प्रदर्शन किया।यह मौत हमारे सामने कई सवाल खड़े करती है, जिनके जवाब हमें तलाश करने हैं।

कोरोना ने डॉक्टर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां पैदा कीं

न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन ब्रुकलिन मेथोडिस्ट अस्पताल में क्वॉलिटीकेयर के वाइस चेयरमैन डॉक्टर लॉरेंस ए मेलनिकर कहते हैं, “कोरोनोवायरस ने पूरे न्यूयॉर्क में इमरजेंसी डॉक्टर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां पैदा की हैं। वैसे डॉक्टर हमेशा हर तरह की त्रासदी से निपटने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन उन्हें खुद बीमार होने या उनकी वजह से परिवार के संक्रमित हाेने की इतनी चिंता नहीं होती, जैसे कोविड के मामले में है।”

खुशमिजाज और मिलनसार
डॉ ब्रीन के दोस्त बताते हैं कि वह न्यूयॉर्क स्की क्लब की सदस्य थीं। बहुत धार्मिक थीं।हफ्ते में एक बार बुजुर्ग लोगों की सेवा के लिए भी जाती थीं। सालसा डांस बेहद पसंद था। अपने आसपास के माहौल काे जीवंत बनाए रखती थीं। बतौर डॉक्टर जो सम्मान और मुकाम उन्होंने हासिल किया, वो तभी पाया जा सकता है, जब आप बहुत प्रतिभाशाली हों।



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डॉक्टर लोर्ना एम ब्रीन मरीजों का इलाज करते-करते वो खुद इनफेक्टेड हो गई थीं।


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रिकी पोंटिंग की बैटिंग और फील्डिंक की नकल करने की कोशिश करते थे अजिंक्य रहाणे

भारतीय टेस्ट टीम के उप-कप्तान अजिंक्य रहाणे को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की फ्रेंचाइजी टीम दिल्ली कैपिटल्स ने पिछले साल नीलामी से पहले ही अपनी टीम में शामिल कर लिया था। रहाणे ने बुधवार को...

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पाकिस्तान में कोविड-19 के मामले 15 हजार के पार, अब तक 327 लोगों की मौत

पाकिस्तान में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों की संख्या बुधवार को 15,000 के आंकड़े को पार कर गई, जबकि इस महामारी से 34 और लोगों की मौत होने के साथ मरने वाले लोगों की कुल संख्या 335 हो गई है। इस बीच,...

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कोविड-19 : तमिलनाडु में दो लोगों की मौत, 100 से अधिक नए मामले

तमिलनाडु में बुधवार को कोरोना वायरस संक्रमण के 104 नए मामले सामने आए हैं जिनमे से 94 मामले अकेले मेट्रोपॉलिटन शहर चेन्नई के हैं। स्वास्थ्य विभाग ने आज कहा कि राज्य में वायरस संक्रमण से दो और लोगों की...

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बढ़ती आबादी को देखते हुए 40-50 सालों की जरूरत के अनुसार जलनिकासी का प्लान बनाएं: नीतीश

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि अभी की व्यवस्था के साथ-साथ बढ़ती आबादी को देखते हुए अगले 40-50 सालों की आवश्यकता का आकलन करते हुए प्लान बनाएं। नाले की उड़ाही का काम निरंतर...

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बिना दर्शकों के IPL खेलने को तैयार हैं अजिंक्य रहाणे, कहा-उनकी सुरक्षा पहले है

इस समय पूरा विश्व कोरोना वायरस से जूझ रहा है और ऐसे में सभी खेल गतिविधयां रुकी हुईं हैं जिसमें आईपीएल भी शामिल है। आईपीएल फ्रेंचाइजी दिल्ली कैपिटल्स के खिलाड़ी अजिंक्य रहाणे ने फ्रेंचाइजी के साथ...

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कोरोना संकट से धड़ाम हुई अमेरिका की अर्थव्यवस्था, पहली तिमाही में 4.8 फीसदी की गिरावट

कोरोनो वायरस महामारी और उससे जुड़ी पाबंदियों के बीच इस वर्ष पहली तिमाही में अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) एक साल पहले की तुलना में 4.8 प्रतिशत गिर गया। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था...

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UGC Guidelines : कॉलेजों का नया सत्र सितंबर से, शनिवार को भी चलेंगी कक्षाएं

देशभर के विश्वविद्यालयों का नया शैक्षणिक सत्र इस बार सितंबर में शुरू होगा। कॉलेजों में अब सप्ताह में पांच की जगह छह दिन पढ़ाई होगी यानी लॉकडाउन अवधि में छूटी पढ़ाई की भरपाई के लिए कॉलेजों में...

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लाइन की वजह से गेंदबाज बनना चाहते थे रोहित शर्मा, आज कहलाते हैं 'हिटमैन'

टीम इंडिया के उपकप्तान रोहित शर्मा (Happy Birthday Rohit Sharma) आज 33 साल के हो गए हैं, आइए आपको बताते हैं उनके करियर की कुछ रोचक बातें

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46% लोग भीड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे, 51% को हेल्थकेयर सुधरने की उम्मीद: रिपोर्ट

कोरोना संकट के चलते लॉकडाउन की वजह से दुनिया में करीब 400 करोड़ लोग अपने घरों में कैद हैं। 31 लाख से ज्यादा मरीज और दो लाख से ज्यादा मौतेंहोने के बावजूद अभी तक कोरोना का कोई वैक्सीन या इलाज नहीं खोजा जा सका है। ऐसे में लॉकडाउन कब और कैसे खुलेगा, इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं।

इसी मामले परग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा ने कोविड-19 बैरोमीटर जारी किया है। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की गई है कि कोरोना संकट के बाद हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा, रोजमर्रा की जिंदगी में क्या-क्या बदलाव आ सकते हैं। 49 फीसदी लोगों ने कहा है कि वे भीड़भाड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे। 51 फीसदी ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद जताई है।

बैरोमीटर अमेरिका को ध्यान में रखकर बनाया गया

रिपोर्ट के मुताबिक, यह बैरोमीटर अमेरिका को ध्यान में रखकर बनाया गया है, लेकिन इसे वैश्विक स्तर यानी दुनिया परभी लागू किया जा सकता है। 10 में 4 लोगों को उम्मीद है कि कोरोना संकट के बाद वर्क फ्रॉम होम का चलन बढ़ेगा। 50% लोगों ने कहा कि वे जब भी बाहर जाएंगे, तो बिना मास्क के नहीं जाएंगे।



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ग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा ने कोविड-19 बैरोमीटर जारी किया है। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की गई है कि कोरोना संकट के बाद हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा।


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अमेरिका के सबसे बड़े मॉल ऑपरेटर ने कहा- कल से 10 राज्यों में खुलेंगे 49 मॉल

(सपना माहेश्वरी और माइकल कोकरी)कोरोनावायरस महामारी ने अब तक सबसे ज्यादा तबाही अमेरिका में मचाई है। यहां संक्रमित लोगों की संख्या 10 लाख के पार हो गई है। मरने वालों का आंकड़ा भी 60 हजार के करीब है। लेकिन, अमेरिका महामारी से जंग के बीच अपनी अर्थव्यवस्था को भी खोलने की कोशिश में लगा है। देश के सबसे बड़े मॉल ऑपरेटर सिमन प्रॉपर्टी ग्रुप ने कहा है कि वह शुक्रवार से करीब 10 राज्यों में अपने मॉल खोलने की शुरुआत कर रहा है। यह ग्रुप इन राज्यों में कुल 10 मॉल खोलेगा।

गाइडलाइन भी तैयार
सिमन प्रॉपर्टी ग्रुप ने मॉल खोलने को लेकर अपनीगाइडलाइन भी तैयार कर ली है। मॉल के सिक्युरिटी ऑफिसर्स और यहां काम करने वाले कर्मचारी ग्राहकों को सोशल डिस्टेंसिंग और हाइजीन के बारे में नियमित तौर पर बताते रहेंगे। मॉल के अंदर खेलने वाले एरिया और पीने के पानी के नल फिलहाल बंद रहेंगे। वॉशरूम में हर एक सिंक के बाद दूसरे सिंक पर टेप लगा होगा। यानी अगर कोई एक सिंक चालू है तो उसके ठीक पास वाला सिंक बंद रहेगा। यूरिनल के साथ भी ऐसा ही किया जाएगा। ग्रुप ने अपनी इस योजना का डॉक्यूमेंट 27 अप्रैल को एक मेमो के जरिए अथॉरिटीज तक पहुंचाया है।

योजना की सफलता रिटेलर्स और उपभोक्ताओं के ऊपर भी निर्भर
हालांकि, इस योजना की सफलता मॉल ऑपरेटर के साथ-साथ रिटेलर्स और उपभोक्ताओं के ऊपर भी निर्भर करेगी। यह देखना है कि मॉल खुलने के बाद कितने दुकानदार अपनी दुकानें खोलते हैं और खरीदारी के लिए कितने लोग वहां पहुंचते हैं। इन मॉल्स में दुकानों की चेन चलाने वाली कंपनी गैप ने कहा है कि वह इस हफ्ते के आखिर तक अपनी दुकानें नहीं खोलेगी। एक अन्य बड़ी किराएदार कंपनी मैकीज ने भी कहा है कि उसकी दुकानें फिलहाल नहीं खुलेंगी।



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अमेरिका के सबसे बड़े मॉल ऑपरेटर सिमन प्रॉपर्टी ग्रुप ने कहा है कि वह शुक्रवार से करीब 10 राज्यों में अपने मॉल खोलने की शुरुआत कर रहा है। -प्रतीकात्मक फोटो


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डॉक्टर ने अपने समर्पण से कई कोरोना पीड़ितों को ठीक किया, दूसरों का दर्द देखा नहीं जाता था, आखिर में जान दे दी

(अली वाटकिंस, माइकल रोथफेल्ड)अमेरिका में कई काेरोना वायरस मरीजों का इलाज कर चुकी एक डॉक्टर ने जान दे दी। मरीजों का इलाज करते-करते वो खुद इनफेक्टेड हो गईं थीं। डॉक्टर लोर्ना एम ब्रीन की मौत दरअसल,डाॅक्टरों पर कोराेना के मानसिक असर को सामने ले आई है। डॉक्टर ब्रीन न्यूयॉर्क के प्रेस्बिटेरियन एलन अस्पताल में इमरजेंसी डिपार्टमेंट की मेडिकल डायरेक्टर थीं। 200 बेड के इस अस्पताल में 170 कोरोना पीड़ित मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

डॉक्टर लोर्नाकाे कोई मानसिक बीमारी नहीं थी

डॉ ब्रीन के पिता डॉ फिलिप ने बताया कि लोर्ना ने कोरोना मरीजों के डरावने मंजर देखे। वो अपना काम पूरी लगन से कर रही थीं। कोरोना संक्रमण से ठीक होकर वह घर तो आ गईं, लेकिन कुछ दिनों बाद वापस अस्पताल जाने लगीं। फिर हमने उन्हें रोका और उसे चार्लोट्सविले ले आए। 49 साल की लोर्ना काे कोई मानसिक बीमारी नहीं थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि कुछ अजीब और अलग लग रहा है। वो निराश लग रहीं थीं। मुझे ऐसा लगा कि कुछ गलत हो रहा है। उन्होंनेमुझे बताया था कि मरीज अस्पताल के सामने एम्बुलेंस से उतारने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं।

अस्पताल ने कहा- डॉ लोर्नाअसली हीरो
डॉक्टर लोर्ना कोरोनावायरस से लड़ रहे लोगों की अग्रिम पंक्ति में थीं। अस्पताल ने डॉ ब्रीन को एक असली हीरो बताया है। अस्पताल ने बयान में कहा-डॉ. लोर्ना ने बेहद मुश्किल वक्त पर लोगों का इलाज करते हुए उच्चतम आदर्शों का प्रदर्शन किया।यह मौत हमारे सामने कई सवाल खड़े करती है, जिनके जवाब हमें तलाश करने हैं।

कोरोना ने डॉक्टर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां पैदा कीं

न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन ब्रुकलिन मेथोडिस्ट अस्पताल में क्वॉलिटीकेयर के वाइस चेयरमैन डॉक्टर लॉरेंस ए मेलनिकर कहते हैं, “कोरोनोवायरस ने पूरे न्यूयॉर्क में इमरजेंसी डॉक्टर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां पैदा की हैं। वैसे डॉक्टर हमेशा हर तरह की त्रासदी से निपटने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन उन्हें खुद बीमार होने या उनकी वजह से परिवार के संक्रमित हाेने की इतनी चिंता नहीं होती, जैसे कोविड के मामले में है।”

खुशमिजाज और मिलनसार
डॉ ब्रीन के दोस्त बताते हैं कि वह न्यूयॉर्क स्की क्लब की सदस्य थीं। बहुत धार्मिक थीं।हफ्ते में एक बार बुजुर्ग लोगों की सेवा के लिए भी जाती थीं। सालसा डांस बेहद पसंद था। अपने आसपास के माहौल काे जीवंत बनाए रखती थीं। बतौर डॉक्टर जो सम्मान और मुकाम उन्होंने हासिल किया, वो तभी पाया जा सकता है, जब आप बहुत प्रतिभाशाली हों।



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रथयात्रा पर सस्पेंस, लॉकडाउन बढ़ा तो टूट सकती है 280 साल की परंपरा या बिना भक्तों के निकलेगी रथयात्रा

लगभग 280 साल में ये पहला मौका होगाजब कोरोना वायरस के चलते रथयात्रा रोकी जा सकती है। ये भी संभव है कि रथयात्रा इस बार बिना भक्तों के निकले।हालांकि, इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। 3 मई को लॉकडाउन के दूसरे फेज की समाप्ति के बाद ही आगे की स्थिति को देखकर इस पर निर्णय लिया जाएगा।

23 जून को रथ यात्रा निकलनी है। अक्षय तृतीया यानी 26 अप्रैल से इसकी तैयारी भी शुरू हो गई है। मंदिर के भीतर ही अक्षय तृतीया और चंदन यात्रा की परंपराओं के बीच रथ निर्माण की तैयारी शुरू हो गई है। मंदिर के अधिकारियों और पुरोहितों ने गोवर्धन मठ के शंकराचार्य जगतगुरु श्री निश्चलानंद सरस्वती के साथ भी रथयात्रा को लेकर बैठक की है, लेकिन इसमें अभी कोई निर्णय नहीं हो पाया है।

नेशनल लॉकडाउन के चलते पिछले एक महीने से भी ज्यादा समय से पुरी मंदिर बंद है। सारी परंपराएं और विधियां चुनिंदा पूजापंडों के जरिए कराई जा रही है।

गोवर्धन मठ (जगन्नाथ पुरी) के शंकराचार्य जगतगुरु स्वामी निश्चलानंदजी सरस्वती ने मंदिर से जुड़े लोगों को सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए रथयात्रा के लिए निर्णय लेने की सलाह दी है। मठ का मत ही इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाएगा। शंकराचार्य ही यहां रथयात्रा के निर्णय पर मुहर लगाएंगे।
  • तीन विकल्पों पर विचार

1. यात्रा निरस्त की जाए
अगर लॉकडाउन आगे बढ़ाया जाता है तो यात्रा निरस्त करना ही विकल्प होगा। इसे लेकर भी मंदिर से जुड़े मुक्ति मंडल के कुछ सदस्य तैयार हैं। सदस्यों का मत है कि भगवान भी चाहते हैं कि उनके भक्त सुरक्षित रहें। ऐसे में यात्रा निरस्त करने में कोई दिक्कत नहीं है।

2. पुरी की सीमाएं सील कर यात्रा निकाली जाए
अगर स्थितियां नियंत्रण में रही तो एक विकल्प ये भी है कि पूरे पुरी जिले में सीमाएं सील करके चुनिंदा लोगों और स्थानीय भक्तों के साथ रथयात्रा निकाली जाए। इसका लाइव टेलिकास्ट चैनलों पर किया जाए जिससे बाहर के श्रद्धालु आसानी से रथयात्रा देख सकें। इस पर सहमति बनने की सबसे ज्यादा संभावना है क्योंकि मठ की तरफ से भी इस पर गंभीरता से विचार करने को कहा गया है।

3. मंदिर के भीतर ही हो यात्रा
मंदिर के अंदर ही रथयात्रा की परंपराओं को पूरा किया जाए। जिसमें मठ और मंदिर से जुड़े लोग ही शामिल हो सकें। अभी भी अक्षय तृतीया, चंदन यात्रा और कई उत्सव मंदिर के अंदर ही किए गए हैं। हालांकि, इस पर रजामंदी होने की उम्मीद सबसे कम है ।

  • 2504 साल पहले 144 साल तक नहीं हुई थी पूजा

मंदिर के रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों के मुताबिक सबसे पहले 2504 साल पहले आक्रमणकारियों के कारण पूरे 144 सालों तक पूजा और विभिन्न परंपराएं बंद रहीं। इसके बाद आद्य शंकराचार्य ने फिर से इन परंपराओं को शुरू किया था। मंदिर को नया स्वरूप 12वीं शताब्दी का है। तब से अब तक लगातार ये परंपराएं निरंतर जारी हैं।

भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा के साथ पुरी में विराजित हैं। ये भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है, यहां शंकराचार्य द्वारा स्थापित पीठ गोवर्धन मठ भी है।
  • 9 दिन में लौटते हैं भगवान जगन्नाथ

भगवान जगन्नाथ की यह रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आरंभ होती है। यह यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर 2 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पर समाप्त होती है। जहां भगवान जगन्नाथ सात दिन तक विश्राम करते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन फिर से वापसी यात्रा होती है, जो मुख्य मंदिर पहुंचती है। यह बहुड़ा यात्रा कहलाती है।

  • जगन्नाथ रथयात्राः खास बातें
  1. भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा- तीनों के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं।भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है।
  2. भगवान जगन्नाथ के रथ के कई नाम हैं जैसे- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि। रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। सारथी का नाम दारुक है। रथ पर हनुमानजी और नरसिंह भगवान का प्रतीक होता है।इसके 16 पहिए होते हैं व ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है।
  3. बलरामजी के रथ का नाम तालध्वज है। इनके रथ पर शिवजी का प्रतीक होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मातलिहोते हैं। यह 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है, जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है।
  4. सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। इस पर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा जाता है। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है।
  5. भगवान जगन्नाथ के रथ पर मढ़े घोड़ों का रंग सफेद, सुभद्राजी के रथ पर कॉफी कलर का, जबकि बलरामजी के रथ पर मढ़े गए घोड़ों का रंग नीला होता है।
  6. बलरामजी के रथ का शिखर लाल-पीला, सुभद्राजी के रथ का शिखर लाल और ग्रे रंग का, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ के शिखर का रंग लाल और हरा होता है।


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Suspense on rath yatra, lockdown may be broken if the tradition of 280 years or without the devotees will come out


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अमेरिका में 14 साल पहले दो वैज्ञानिकों ने पहली बार बुश सरकार के सामने सोशल डिस्टेंसिंग नीति बनाने का प्रस्ताव रखा था, पर अधिकारियों ने खिल्ली उड़ा दी थी

एरिक लिप्टन और जेनिफर स्टीनहाऊर. कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित देश अमेरिका है। अब तक 60 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। यदि 14 साल पहले कुछ वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग कानून (फेडरल पॉलिसी) के प्रस्ताव को खारिज न किया जाता तो...इस मौत की त्रासदी को रोका जा सकता था।
ऐसा (उपरोक्त बातें) अमेरिका के दो वरिष्ठ सरकारी चिकित्सक डॉ. रिर्चड हैशे और डॉ. कार्टर मेकर का कहना है। वर्तमान में डॉ. हैशे कैंसर विशेषज्ञ सलाहकार के तौर व्हाइट हाउस में, जबकि डॉ. मेकर वेटरन्स अफेर्यस विभाग में एक चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। दोनों ने न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार से अमेरिका में सोशल डिस्टेंसिंग नीति के जन्म और उसके खारिज होने की कहानी को साझा किया।

पढ़िए डॉ. हैशे और डॉ. मेकर की जुबानी...सामाजिक दूरी के जन्म की अनकही कहानी...

  • अधिकारियों ने सोशल डिस्टेंसिंग नीति के प्रस्ताव की खिल्ली उड़ाई, कहा- घर में दुबकने से बेहतर है महामारी की दवा खोजी जाए

डॉ. मेकर कहते हैं कि यह करीब 14 साल पहले की बात होगी। मैं और डॉ. हैशे वॉशिंगटन के उपनगरीय स्थित एक बर्गर शॉप में अपने कुछ सहयोगियों के साथ मुलाकात करने गए। वह मुलाकात दरअसल उस (सोशल डिस्टेंसिंग) प्रस्ताव की अंतिम समीक्षा से जुड़ी थी, जिसमें यह तय किया जाना था कि अगली बार अमेरिका पर अगर किसी विनाशकारी महामारी का हमला होता है, तो लोग सामाजिक दूरी बनाएंगे और घर से ही काम करेंगे। जब हमने यह प्रस्ताव पेश किया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने न सिर्फ इसे शक की नजर से देखा, बल्कि इस प्रस्ताव की खिल्ली भी उड़ाई। अन्य अमेरिकियों की तरह समीक्षा करने आए अधिकारियों ने भी दवा उद्योग के प्रति आश्वस्त दिखे। उनका जोर किसी भी महामारी से बचने के लिए घरों में दुबक कर बैठ जाने से बेहतर स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करते हुए इलाज के नए तरीके ईजाद करने पर था।

  • किसी भी महामारी से बचने का सबसे अच्छा इलाज सोशल डिस्टेंसिंग है, लेकिन इसे अव्यावहारिक और गैर जरूरी बताया गया

डॉ. हैशे कहते हैं कि कोरोना वायरस पूरे विश्व के लिए बिल्कुल नया है। ये कहां से आया है? कैसे रुकेगा? इसका इलाज क्या है? किसी के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है। लेकिन एक बात सौ फीसद सही साबित हो गई है कि इसे सोशल डिस्टेंसिंग से ही रोका जा सकता है। जिन देशों में इस पर थोड़ा या ज्यादा काबू पाया गया है, वहां पर यही हथियार अपनाया गया है। किसी भी महामारी से बचने का सबसे अच्छा इलाज सोशल डिस्टेंसिंग ही है। इसमें जान जाने की दर बहुत कम होती है। मैं और डॉ. मेकर इसी बात पर जोर दे रहे थे। जिस सोशल डिस्टेंसिंग से लोग आज परिचित हैं या फिर हो रहे हैं, दरअसल इसे मध्यकाल से ही में अपनाया जा रहा है। 2006-07 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की पहल पर हमने एक प्रस्ताव रखा था कि देश में अगली संक्रामिक बीमारी से मुकाबला करने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता, लेकिन संघीय नौकरशाहों ने तब इसे अव्यावहारिक, गैर जरूरी और राजनीतिक रूप से असंभव (नॉन फिजिबल) कहकर नकार दिया था।

  • दोस्त डॉ. ग्लास की 14 वर्षीय बेटी ने स्कूल में सोशल डिस्टेंसिंग पर बनाया था साइंस प्रोजेक्ट उसी से मिला आइडिया

डॉ. मेकर कहते हैं कि इनफ्लुएंजा के नए प्रकोप और टेमीफ्लू जैसी दवा के सभी संक्रामक बीमारियों में कारगर न होने की सच्चाई को देखते हुए डॉ. हैशे और मैं अपनी टीम के साथ बड़े पैमाने के संक्रमण का मुकाबला करने के लिए अन्य तरीके की खोज में लगे हुए थे। उसी दौरान न्यू मैक्सिको स्थित सैंडिया नेशनल लेबोरेट्री में वरिष्ठ वैज्ञानिक रॉबर्ट ग्लास जो कि मेरे अच्छे दोस्त भी हैं, उनसे इस बारे में बात हुई। ग्लास की 14 साल की बेटी लॉरा ने अपने अल्बुकर्क हाईस्कूल में सोशल नेटवर्क का एक प्रोजेक्ट बनाया था। जब डॉ. ग्लास ने उसे देखा, तो उनकी जिज्ञासा अचानक बढ़ गई थी। प्रोजेक्ट के अनुसार स्कूली बच्चे जो कि सामाजिक तानेबाने और स्कूल बसों और कक्षाओं में एक साथ इतनी बारीकी से जुड़े रहते हैं कि महामारी के दौरान वे एक दूसरे के लए संक्रामक फैलाने के परिपूर्ण संवाहक (कंप्लीट कैरिअर) बन सकते हैं। डॉ. ग्लास ने अपनी बेटी के इस प्रोजेक्ट के माध्यम से यह पता लगाया कि इस आपसी जुड़ाव को तोड़कर ही संक्रामिक बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है। उनका अध्ययन चौंकाने वाला था। 10 हजार की आबादी वाले शहर के स्कूलों को बंद करने से सिर्फ 500 लोग संक्रमित हो सकते थे, जबकि सारे स्कूलों को खुला रखने से शहर की आधी आबादी संक्रमित होती। मुझे जब इस अध्ययन का पता चला, तो मैं चकित हो गया। डॉ. हैशे के साथ मैंने क्लास रूम और स्कूल बसों में छात्रों के बीच की दूरी (कम से कम एक मीटर) के बारे में जाना। हमने किसी भी महामारी में नुकसान को कम करने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को किस तरह और किस समय लागू किया जाना चाहिए? इस बारे में गहन चर्चा की। वास्तव में यदि डॉ. ग्लास से बात न होती और उनकी बेटी ने अगर प्रोजेक्ट न बनाया होता तो हम सोशल डिस्टेंसिंग प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार न कर पाते।

  • 2001 में बुश ने जान बेरी की किताब ‘द ग्रेट इन्फ्लुएंजा’ पढ़ी थी, जो 1918 के स्पैनिश फ्लू पर केंद्रित थी, इसके बाद वे ठोस नीति बनाना चाहते थे

डॉ. हैशे कहते हैं कि दरअसल, सोशल डिस्टेंसिंग पर जोर देने की जार्ज बुश की कवायद 2005 की गर्मी में शुरू हुई थी। 2001 में अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद वैश्विक आतंकवाद के प्रति आशंकित बुश ने उसी दौरान जान बेरी की किताब ‘द ग्रेट इन्फ्लुएंजा’ पढ़ी, जो 1918 के स्पैनिश फ्लू पर केंद्रित थी। उसी साल विएतनाम में बर्ड फ्लू समेत कई संक्रामिक बीमारियों ने उनकी आशंका को और बढ़ा दी, जिनमें पक्षियों और पशुओं से मनुष्य संक्रमित हो रहे थे। बुश चाहते थे कि किसी भी महामारी से बचने के लिए अमेरिका के पास ठोस रणनीति हो। 2005 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के एक कार्यक्रम में उन्होंने इस पर विस्तार से चर्चा भी की थी। उनके प्रशासन में सोशल डिस्टेंसिंग की धारणा को प्रोत्साहित किया गया। बराक ओबामा प्रशासन ने पांच साल तक इसकी समीक्षा करने के बाद 2017 में इसका डॉक्यूमेंटेशन (दस्तावेजीकरण) किया, लेकिन मौजूदा डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस पर गौर नहीं किया। खुद ट्रंप द्वारा कोविड-19 के खतरे को कम करके आंकने और उनकी सरकार द्वारा वायरस की चेतावनी की अनसुनी करने के कारण जब खतरा बहुत अधिक बढ़ गया, और संक्रमण तथा मौत के मामले बढ़ने लगे, तब ट्रंप ने राज्यों को लॉकडाउन (सोशल डिस्टेंसिंग का एक प्रारूप) के लिए प्रोत्साहित किया। 14 साल पहले यदि हमें ‘शटअप’ न किया गया होता जो कि अपमानित करने के लिए बहुत भद्दा शब्द है। तो शायद आज अमेरिका में सोशल डिस्टेंसिंग फेडरल पॉलिसी का रूप ले चुका होता और इसे किसी भी महामारी के दौरान लागू करना लाजमी होता।



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तस्वीर 2005 की है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।


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कैंसर से लड़ते हुए कहा था- मरा नहीं हूं, काम से जिंदा रहने दो

शांत चेहरे और आंखों से अदाकारी से ‘मकबूल’ 53 साल के इरफान खान नहीं रहे। उन्हें न्यूरो इंडोक्राइन ट्यूमर (कैंसर) था। आंतों में संक्रमण होने पर उन्हें मंगलवार काे अस्पताल लाया गया, जहां बुधवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। 4 दिन पहले उनकी मां सईदा बेगम का भी निधन हो गया था। इस मौके पर उनकी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम के निर्देशक होमी अदजानिया ने इरफान के बारे में कुछ लिखा। आप भी पढ़िए।

होमी ने बताया कि जिंदगी के आखिरी पलों में भी अपने काम से जिंदा रहने की ख्वाहिश इरफान में ही थी। वे जीवन के सर्कस काे बाहर खड़े हाेकर देखते थे। मैंने उनसे पूछा कि जब वह इलाज करवा रहे हैं ताे शूटिंग क्याें जारी रखना चाहते हैं? उन्हाेंने कहा- ‘मैं मरा नहीं हूं ना...ताे मुझे जिस काम से प्यार है, वह करके जिंदा रहने दाे।’ हमारा फिल्म क्रू मजबूती के लिए उनकी ओर ही देखता था। इरफान ने कभी अपनी समस्या काे दूसराें की समस्या नहीं बनाया। फिल्म तो बन रही थी, लेकिन हममें से किसी काे पक्का पता नहीं था कि आगे क्या हाेने वाला है।

जब इरफान ने अनजान लोगों से भी खूब बातें कीं

होमी ने कहा कि हम लंदन में रेस्तरां में थे कि राह चलता एक शख्स रुक गया। इससे पहले कि वह बाेलता, इरफान बाेल पड़े, ‘प्लीज! अब ये मत कहना कि आपसाेच रहे हैं कि मैं वह भद्दा एक्टर हूं। अगर वह मुझे मिल जाए ताे मैं मुकदमा कर दूंगा।’ वह चला गया। उसे पता ही नहीं चला कि इरफान खुद के नाम पर ही मजाक कर गए। ऐसा ही एक वाकया न्यूयाॅर्क में हुआ। वहां एक दंपती अड़ गया कि इरफान जाने-पहचाने लग रहे हैं। दंपती ने बताया कि वे एक दाेस्त जाॅन की पार्टी में मिले थे। मजे की बात देखिए, इरफान ने उनसे खूब बातें कीं। बाद में मुझसे कहा कि वे न तो जॉन को जानते हैं, न उस दंपती को।

परिवार ने कहा- वे मजबूत इरादों वाले इंसान थे
परिवार ने एक नाेट जारी किया। इसमें लिखा, ‘मुझे यकीन है कि मैं हार चुका हूं...इरफान 2018 में जब कैंसर से लड़ रहे थे, तब उन्हाेंने अपने नोट में यह बात लिखी थी। आज वो हमारे बीच नहीं रहे। इरफान मजबूत इरादों वाले इंसान थे, जाे अंत तक लड़े। इरफान के परिवार में पत्नी सुतपा और दो बेटे बाबिल और आर्यन हैं।

इरफान का आखिरी संदेश- मैं आपके साथ हूं भी और नहीं भी...मेरा इंतजार करिएगा

।'हैलो भाइयो-बहनो, नमस्कार। मैं इरफान। मैं आज आपके साथ हूं भी और नहीं भी। मेरे शरीर के अंदर कुछ अनचाहे मेहमान बैठे हुए हैं। उनसे वार्तालाप चल रही है। देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है। जैसा भी होगा आपको जानकारी दे दी जाएगी।'

बीमारी का पता चलने पर अस्पताल में लिखा था- कई बार सफर ऐसे भी खत्म होता है
अभी तक मैं एक बेहद अलग खेल का हिस्सा था। मैं एक तेज भागती ट्रेन पर सवार था। मेरे सपने थे, योजनाएं थीं। मैं पूरी तरह इस सब में व्यस्त था। तभी ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए मुझे रोका। वह टीसी था। बोला- आपका स्टेशन आने वाला है। नीचे उतर जाएं। मैं परेशान हो गया। नहीं-नहीं मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है। उसने कहा- नहीं, आपका सफर यहीं तक था। कभी-कभी यह सफर ऐसे ही खत्म होता है।’

सिर्फ 20 लाेग अंतिम संस्कार में शामिल हुए
बुधवार शाम 4 बजे इरफान काे सुपुर्द-ए-खाक किया गया। लाॅकडाउन के कारण परिवार सहित सिर्फ 20 लाेग ही अंतिम संस्कार में शामिल हाे पाए। इरफान राजस्थान के जयपुर के आमेर ओड़ इलाके में जन्मे थे।



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अभिनेता इरफान खान का जन्म 7 जनवरी 1967 को हुआ था। उनका इंतकाल 29 अप्रैल 2020 को हुआ। -फाइल फोटो


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इंसानी कोशिका को पूरी तरह घेरकर उसमे घुस जाता है कोरोनावायरस, 20 लाख गुना बड़ा करके उतारी तस्वीरों से पता चला

अमेरिका और ब्राजील के दो संस्थानों ने कोविड-19 फैलाने वाले कोरोनावायरस SARS-COV-2 की स्पष्ट तस्वीरें उतारे में सफलता पाई हैं। इन तस्वीरों को इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोस्कोप की मदद से उतारा गया है। इसके लिए माइक्रोस्कोप में वायरस के संक्रमण की स्थिति को 20 लाख गुना बड़ा करके देखा गया जिसमें पता चला कि किस तरह से यह वायरस इंसानी कोशिका को पूरी तरह घेर लेता है और उसके अंदर घुस जाता है। इसके बार वायरसउसके ही जीवन रस औरप्रोटीन के साथ जुड़कर कोशिका कोनष्ट होने पर मजबूर करदेता है।

ये नईतस्वीरें अमेरिका के मैरीलैंड स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिसीज (एनआईएआईडी) इंटीग्रेटेड रिसर्च फैसिलिटी (आईआरएफ) फोर्ट फोर्ट्रिक, नेशनल हेल्थ इंस्टीट्यूट(एनआईएच) और ब्राजील के ओसवाल्डो क्रूजफाउंडेशन के वैज्ञानिकों ने अलग-अलग प्रयोगों के दौरान उतारी हैं। भारत में भी बीते महीनेनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के शोधकर्ताओं ने कोरोनावायरस की पहली तस्वीरें ली हैं।

वैज्ञानिकों नेट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का उपयोग करते हुए, लेंस की मदद से ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया जिससे सैम्पल को बीस लाख गुना बढ़ाया जा सकता है। इसके लिएटीम ने सेल कल्चर बनाया और फिर कोशिकाओं को वायरस से संक्रमित होनेकी प्रक्रिया को इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की मदद से देखा और वायरस के संक्रमण के तरीके कोसमझा।

तस्वीरों से समझते हैं कोरोना वायरस और उसका आक्रमण

नए नोवलकोरोनावायरस (Sars-Cov-2) के चारों ओर एक ताज नुमा (क्राउन) संरचना है, जिसके कारण इसे कोरोना नाम दिया गया है। लैटिन में क्राउन का मतलब कोरोना होता है।नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट के डिप्टी डायरेक्टर डॉ अतानु बसु के मुताबिक, कोरोनावायरस के एक कण काआकार 75 नैनोमीटर (एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा)होताहै।

ये तस्वीर अमेरिका के मैरीलैंड स्थित रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने ली है। स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोग्राफ तकनीक से ली गई इस रंगीन तस्वीर में इंसानी शरीर की एपोप्टोटिक कोशिका (बैंगनी रंग में) को SARS-COV-2 वायरस (पीले रंग में) बहुत अधिक संख्या में झुंड बनाकर आसपास से घेरे हुए हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक एपोप्टोटिक कोशिकाएं सिंगल या एक समूह में होती है। ये ऐसी कोशिकाओं का वह रूप है जो वायरस से संक्रमित हो जाने के बाद खुद ही अपने अंदर डेथ प्रोग्राम शुरू कर लेता है और बहुत जल्दी ये खुद ही नष्ट हो जाती हैं।

हर एक कोशिका एक मेम्ब्रेन या झिल्ली में सुरक्षित होती है। 02 अप्रैल को पहली बार एक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप तस्वीर में SARS-CoV2 का पहला ब्लैक एंड व्हाइट फोटो उतारा गया। इसमें एक लाल रंग के तीर से समझाया गया है कि वायरस की सतह पर विशिष्ट ग्लाइकोप्रोटीन के तंतु होते हैं जो कोशिका को पकड़ने के काम आते हैं। इस तस्वीर में छोटे काले धब्बों के रूप में वायरस दिखाई दे रहे हैं।

SARS-COV-2 वायरस कोशिका के साइटोप्लाज्म यानी एक कोशिका के जीवनरस में संक्रमण प्रक्रिया शुरू करता है। साइटोप्लाज्म के अंदर ही कोशिका का केंद्र न्यूक्लिअस होता है, जो कोशिका की आनुवंशिक सामग्री को जमा करने के लिए जिम्मेदार होता है। जैसे ही वायरस संक्रमित कोशिका के अंदर घुसता है तो उसकी झिल्ली के अंदर ही तेजी से अपनी संख्या बढ़ाना शुरू कर देता है। इस चित्र में बांयी ओर एक सफेद कोशिका में गोल-गोल कोरोनावायरस साफ देखे जा सकते हैं।

इस तस्वीर में काले रंग के धब्बों के रूप में SARS-COV-2 वायरस के झुंड नजर आ रहे हैं। एक बार कोशिका में घुसने और उसके साइटोप्लाज्म को संक्रमित करने के बाद ये वायरस न्यूक्लिअस को निशाना बनाते हैं जिसमें जेनेटिक मटेरियल यानी डीएनए होता है। इससे कोशिका की पूरी कार्यप्रणाली नष्ट हो जाती है और कोशिका स्वयं को नष्ट करने का प्रोग्राम शुरू कर देती है। तस्वीर में V शेप में कुछ संरचनाए नजर आ रही हैं जो एंटीबॉडीज हैं। तीव्र संक्रमण की स्थिति में इन एंटीबॉडीज की संख्या में कम होने और क्षमतावान न होने के कारण ये वायरस का मुकाबला नहीं कर पाती हैं और शरीर में संक्रमण तेजी से फैलता है, जिससे मरीज को सांस लेने में परेशानी होने लगती है और उसे वेंटीलेटर पर ले जाना पड़ता है। इसके बाद जीवन रक्षक मशीनों,दवाओं और मरीज की खुद कीइम्यूनिटी की भूमिका अहम होती है।



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Corona virus completely engulfs human cell, 20 million times larger than photos revealed


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हमारे देश में सवाल करना बदतमीजी मानी जाती है, सवाल वाली फिल्मों के खरीदार नहीं मिलते, ये बात खलती है: इरफान

अभिनेता इरफान ने दुनिया को अलविदा कह दिया। रुखसती से पहले उनका आखिरी इंटरव्यू दैनिक भास्कर ने किया था। खराब तबीयत के चलते वह सीधे बात तो नहीं कर पा रहे थे, पर उन्होंने सवाल मंगवा कर उनके जवाब दिए थे। इसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के फलसफे, सह कलाकारों और अपनी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम पर ज्यादा बात की थी। ये इंटरव्यू अमित कर्ण ने किया था। पढ़ें...


Q. आज की तारीख में फिल्ममेकिंग के कौन से पहलू आप को इंस्पायर कर रहे हैं? हाल की किन फिल्मों ने आप को सरप्राइज किया है? और किन तकनीकों और स्टोरीटेलिंग के तरीकों से बॉलीवुड को लैस होते देखना चाहेंगे?

आज के तारीख में नए चेहरों का आना और उनका छा जाना बहुत कमाल की बात है। अलग कहानियों का महत्वपूर्ण स्थान है। बिना फूहड़ हुए फिल्में एंटरटेनिंग बन रही हैं, यह बड़ी बात है। यह अहम हासिल है हमारे इंडस्ट्री के लिए। हॉलीवुड में एक बहुत खास बात है कि वहां फार्मूला फिल्में भी बनती हैं तो वे सवाल करती हैं। हमारे देश में सवाल करना आज भी बदतमीजी मानी जाती है। सवाल करने वाली डॉक्यूमेंट्री, फिल्में अगर बनाई भी जाएं तो उनके खरीदार नहीं है। यह कमी तो खलती है।


Q.देश दुनिया की शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजी लैंग्वेज की गिरफ्त में हैं। इससे हमारी शिक्षा व्यवस्था पर क्या असर पड़ा है। क्या हम उस गिरफ्त से अलग होते नजर आ रहे हैं?
हम अंग्रेजी की गिरफ्त में हैं, इसे नकार तो नहीं सकते। पर आत्मसम्मान भाषा से तय नहीं होता। अंग्रेजी जान लेने से मैं ज्यादा संवेदनशील हो जाऊंगा या अच्छा साहित्यकार या कलाकार बन जाऊंगा, ऐसा नहीं है। मगर हम इस बात को भी नकार नहीं सकते कि हिंदुस्तान में गलत अंग्रेजी हमारे रुतबे को तहस-नहस करती है। अंग्रेजी जानना बहुत अच्छी बात है, पर उसे मापदंड बनाकर किसी को आंकना गलत है। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि अंग्रेजी का असर खत्म हो रहा है। मगर हां बदलाव तो आ रहा है।


Q.मतलब अंग्रेजी कमजोर होने के चलते, जो कॉम्प्लेक्स रहा करता था वह कम हुआ है?
जी हां। मुझे अब पेन का उच्चारण पैण करने पर इतनी शर्मिंदगी नहीं होती, जितनी दस साल पहले हुआ करती थी। क्योंकि अमेरिका-इंग्लैंड के अलावा ऐसे कई देश हैं, जो शायद हमें याद ना रहते हों पर वह सब अपनी मातृभाषा से शर्मसार नहीं होते।


Q.अंग्रेजी मीडियम में कौन से रंग हैं, जो इसे पिछली फिल्म से अलग करते हैं?
हिंदी मीडियम से तो बिल्कुल अलग है अंग्रेजी मीडियम। एक बाप है जो बस दोनों फिल्मों में कॉमन है। पर दोनों फिल्मों की पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग है। एक दिल्ली के चांदनी चौक में ओरिजिनल मनीष मल्होत्रा की कॉपी कर रहा था। वह दिल्ली-6 की गलियों से विस्थापित होकर पॉश कॉलोनी में रहने की विवशता पर थी। वह भी अपने बच्चे की एडमिशन के लिए।


Q.एक और कॉमन चीज है कि यह भी हल्के-फुल्के अंदाज में ही कुछ गहरा कहना चाहती है?
जी हां। अंग्रेजी मीडियम तो राजस्थान का रंग लिए हुए है। कहानी तो चिड़ियों के उड़ान की तरह है। आप खाना देते रहें तो मुंडेर पर वापस लौटना है। यह चिड़ा और चिडुते की कहानी है। इसमें शैली भी अलग रखी गई है। हल्के-फुल्के अंदाज में कुछ कहने की कोशिश की गई है। जैसा मैंने पहले भी कहा था। यह भी हंसाएगी, रुलाएगी और फिर हंसाएगी। रोते-रोते हंसने का मजा ही कुछ और है ना।


Q.नवाज के साथ द लंचबॉक्स में आप की केमिस्ट्री और हिंदी मीडियम से दीपक डोबरियाल के संग का साथ दोनों की कॉमेडी को आप को कैसे देखते हैं? अपने जीवन में किन कुछ कलाकारों से आप को सीखने सिखाने को मिला। कोई वाकया शेयर कर सकें...
नवाज बहुत ही बेहतरीन अदाकार हैं। दीपक और मेरा साथ हिंदी मीडियम में भी था और अब भी है। दीपक के साथ इंप्रोवाइजेशन बहुत होता है। जुगलबंदी कह सकते हैं इसे। कितना भी अच्छा शॉट दो वह कैच पकड़ लेता है।



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In our country, questioning is still considered to be insolent, buyers of the questioning films are not found, this thing is missing: Irrfan


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कैंसर से लड़ते हुए कहा था- मरा नहीं हूं, काम से जिंदा रहने दो

शांत चेहरे और आंखों से अदाकारी से ‘मकबूल’ 53 साल के इरफान खान नहीं रहे। उन्हें न्यूरो इंडोक्राइन ट्यूमर (कैंसर) था। आंतों में संक्रमण होने पर उन्हें मंगलवार काे अस्पताल लाया गया, जहां बुधवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। 4 दिन पहले उनकी मां सईदा बेगम का भी निधन हो गया था। इस मौके पर उनकी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम के निर्देशक होमी अदजानिया ने इरफान के बारे में कुछ लिखा। आप भी पढ़िए।

होमी ने बताया कि जिंदगी के आखिरी पलों में भी अपने काम से जिंदा रहने की ख्वाहिश इरफान में ही थी। वे जीवन के सर्कस काे बाहर खड़े हाेकर देखते थे। मैंने उनसे पूछा कि जब वह इलाज करवा रहे हैं ताे शूटिंग क्याें जारी रखना चाहते हैं? उन्हाेंने कहा- ‘मैं मरा नहीं हूं ना...ताे मुझे जिस काम से प्यार है, वह करके जिंदा रहने दाे।’ हमारा फिल्म क्रू मजबूती के लिए उनकी ओर ही देखता था। इरफान ने कभी अपनी समस्या काे दूसराें की समस्या नहीं बनाया। फिल्म तो बन रही थी, लेकिन हममें से किसी काे पक्का पता नहीं था कि आगे क्या हाेने वाला है।

जब इरफान ने अनजान लोगों से भी खूब बातें कीं

होमी ने कहा कि हम लंदन में रेस्तरां में थे कि राह चलता एक शख्स रुक गया। इससे पहले कि वह बाेलता, इरफान बाेल पड़े, ‘प्लीज! अब ये मत कहना कि आपसाेच रहे हैं कि मैं वह भद्दा एक्टर हूं। अगर वह मुझे मिल जाए ताे मैं मुकदमा कर दूंगा।’ वह चला गया। उसे पता ही नहीं चला कि इरफान खुद के नाम पर ही मजाक कर गए। ऐसा ही एक वाकया न्यूयाॅर्क में हुआ। वहां एक दंपती अड़ गया कि इरफान जाने-पहचाने लग रहे हैं। दंपती ने बताया कि वे एक दाेस्त जाॅन की पार्टी में मिले थे। मजे की बात देखिए, इरफान ने उनसे खूब बातें कीं। बाद में मुझसे कहा कि वे न तो जॉन को जानते हैं, न उस दंपती को।

परिवार ने कहा- वे मजबूत इरादों वाले इंसान थे
परिवार ने एक नाेट जारी किया। इसमें लिखा, ‘मुझे यकीन है कि मैं हार चुका हूं...इरफान 2018 में जब कैंसर से लड़ रहे थे, तब उन्हाेंने अपने नोट में यह बात लिखी थी। आज वो हमारे बीच नहीं रहे। इरफान मजबूत इरादों वाले इंसान थे, जाे अंत तक लड़े। इरफान के परिवार में पत्नी सुतपा और दो बेटे बाबिल और आर्यन हैं।

इरफान का आखिरी संदेश- मैं आपके साथ हूं भी और नहीं भी...मेरा इंतजार करिएगा

।'हैलो भाइयो-बहनो, नमस्कार। मैं इरफान। मैं आज आपके साथ हूं भी और नहीं भी। मेरे शरीर के अंदर कुछ अनचाहे मेहमान बैठे हुए हैं। उनसे वार्तालाप चल रही है। देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है। जैसा भी होगा आपको जानकारी दे दी जाएगी।'

बीमारी का पता चलने पर अस्पताल में लिखा था- कई बार सफर ऐसे भी खत्म होता है
अभी तक मैं एक बेहद अलग खेल का हिस्सा था। मैं एक तेज भागती ट्रेन पर सवार था। मेरे सपने थे, योजनाएं थीं। मैं पूरी तरह इस सब में व्यस्त था। तभी ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए मुझे रोका। वह टीसी था। बोला- आपका स्टेशन आने वाला है। नीचे उतर जाएं। मैं परेशान हो गया। नहीं-नहीं मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है। उसने कहा- नहीं, आपका सफर यहीं तक था। कभी-कभी यह सफर ऐसे ही खत्म होता है।’

सिर्फ 20 लाेग अंतिम संस्कार में शामिल हुए
बुधवार शाम 4 बजे इरफान काे सुपुर्द-ए-खाक किया गया। लाॅकडाउन के कारण परिवार सहित सिर्फ 20 लाेग ही अंतिम संस्कार में शामिल हाे पाए। इरफान राजस्थान के जयपुर के आमेर ओड़ इलाके में जन्मे थे।



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अभिनेता इरफान खान का जन्म 7 जनवरी 1967 को हुआ था। उनका इंतकाल 29 अप्रैल 2020 को हुआ। -फाइल फोटो


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पहली बार सिर्फ 15-16 लोगों की मौजूदगी में केदारनाथ के कपाट खुले; रावल क्वारैंटाइन में, नहीं थे मौजूद

केदारनाथ धाम के पट बुधवारसुबह 6 बजकर10 मिनट पर खुले। उत्तराखंड में मौजूद यह 1000 साल पुराना मंदिर हर साल सर्दियों के छह महीने बंद रहता है। इस बार कपाट खुलने के दौरान 15-16लोग ही मौजूद रहे। पिछले साल कपाट खुलने के दिन 3 हजार लोगों ने केदारनाथ के दर्शन किए थे।केदारनाथ मंदिर के रावल कपाट खुलने के दौरान मौजूद नहीं थे, वे क्ववारैंटाइन हैं।

मंत्रोच्चार के साथ खोले गए बाबा केदार के कपाट।

आज सबसे पहले मुख्य पुजारी ने भगवान केदारनाथ की डोली की पूजा की और भोग लगाया। उसके बाद मंत्रोच्चारण के बीच मंदिर के कपाट खोले गए। फिर डोली ने मंदिर में प्रवेश किया। इसके बाद पुजारियों ने मंदिर की सफाई की, भगवान की पूजा की और भोग लगाया।

मंदिर और यात्रा से जुड़ी कई परंपराओं को इस बार बदलना पड़ा
हर बार इस पूजा और भोग के बाद मंदिर को दर्शन के लिए खोला जाता है। लेकिन इस बार दर्शन के लिए यात्रियों के यहां आने पर मनाही है। कोरोना के चलते इस इलाके में भी प्रशासन ने भीड़ जमा होने पर पाबंदी लगा रखी है। यही वजह थी कि मंदिर और यात्रा से जुड़ी कई परंपराओं को इस बार बदलना पड़ा। केदारनाथ मंदिर के रावल कपाट खुलने के दौरान मौजूद नहीं थे। वह 19 अप्रैल को महाराष्ट्र से उत्तराखंड पहुंचेऔर ऊखीमठ में 14 दिन के क्वारैंटाइन में हैं। रावल 3 मई को केदारनाथ पहुंचेंगे।

मंदिर को 5 क्विंटल फूलों से सजाया गया है।

यात्रा होगी या नहीं इस पर फैसला अब तक नहीं हो सका है
वहीं, ऊखीमठ से केदारनाथ की डोली इस बार दो दिन में ही पहुंच गई और उसे गाड़ी में लाया गया। यह दूसरा मौका है जब डोली गाड़ी में आई है, इससे पहले देश में इमरजेंसी के वक्त ऐसा किया गया था। कोरोना की वजह से देशभर में जारी लॉकडाउन का प्रभाव चारधाम यात्रा पर भी पड़ा है। यात्रा होगी या नहीं इस पर फैसला अब तक नहीं हो सका है। पिछले साल 32 लाख लोगों ने चारधाम यात्रा की थी।

देशभर में कोरोना के चलते लॉकडाउन है, लिहाजा कपाट खुलने के दौरान इस इस बार 15-16 लोग ही रहे।

15 मई को खुलेंगे बद्रीनाथ के कपाट

कपाट खुलने की तारीख को लेकर भी विवाद हुआ था और सरकार ने इसे आगे बढ़ाने को कहा था,लेकिन रावल और हकहकूकधारियोंकी एक बैठक में पहले से तय तारीख पर ही पट खोलने का फैसला लिया गया। वहीं, बद्रीनाथ के कपाट पहले 30 तारीख को खुलने थे, जिसे अब बदलकर 15 मई कर दिया गया है।

12 ज्योतिर्लिंगों में यह सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बना मंदिर है

मंदिर के पट हर साल वैशाख महीने यानी मार्च-अप्रैल मेंखोले जाते हैं। करीब 6 महीने तक यहां दर्शन और यात्रा चलती है। इसके बाद कार्तिक माह यानी अक्टूबर-नवंबर में फिर कपाट बंद हो जाते हैं। कपाट बंद होने के बाद केदारनाथ की डोली ऊखीमठ ले जाई जाती है, जहां ओंकारेश्वर मंदिर में उनकी पूजा होती है। 12 ज्योतिर्लिंगों में यह सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बना मंदिर है, जिसे आदि शंकराचार्य ने बनवाया था।

भगवान केदार के दर्शन करने के बाद बाहर निकलकर खुशी जाहिर करता एक तीर्थयात्री।


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सबसे पहले मुख्य पुजारी ने भगवान केदारनाथ की डोली की पूजा की और भोग लगाया। उसके बाद मंत्रोच्चारण के बीच मंदिर के कपाट खोले गए।


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31 हजार 360 केस: एक दिन में रिकॉर्ड 1902 संक्रमित मिले; नगालैंड ने पेट्रोल-डीजल पर कोविड-19 सेस लगाया; ऐसा देश में पहली बार

देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या 31 हजार 360हो गई है। मंगलवार को 1903 रिपोर्ट पॉजिटिव आईं। यह एक दिन में मिले मरीजों की सबसे अधिक संख्या है। इनमेंमहाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 728 मरीज मिले। इसके बादगुजरात में 226, मध्यप्रदेश में 222, दिल्ली में 206औरराजस्थान में 102 मरीज बढ़े। ये आंकड़े covid19india.org और राज्य सरकारों से मिली जानकारी के अनुसार हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में 29 हजार 435 संक्रमित हैं। इनमें से 21 हजार 632 का इलाज चल रहा है, 6868 ठीक हुए हैं और 934 की मौत हुई है।इस बीच, नगालैंड सरकार ने पेट्रोल पर 6 रुपए और डीजल पर 5 रुपए कोविड-19 सेस लगाया। ऐसा करने वालायह देश का पहला राज्य है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में कोरोना मरीजों की रिकवरी रेट 23.83%हो गई है। 17 ऐसे जिले हैं जहां पहले केस आए थे, लेकिन पिछले 28 दिनों में यहां कोई मामले सामने नहीं आए। मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने बताया कि आईसीएमआर का कहना है कि कोरोना के लिए कोई थैरेपी नहीं है। ऐसे में प्लाज्मा थैरेपी को इसके लिए इलाज नहीं कहा जा सकता है। आईसीएमआर ने सिर्फ अध्ययन करने के लिए इसे शुरू किया है।

5 दिन जब संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले आए

दिन मामले
28 अप्रैल 1903
25 अप्रैल 1835
23 अप्रैल 1667
26 अप्रैल 1607
19 अप्रैल 1580

26 राज्यऔर 6 केंद्र शासित प्रदेशों में फैला संक्रमण
कोरोनावायरस का संक्रमणदेश के 26 राज्यों में फैला है।6 केंद्र शासित प्रदेश भीइसकी चपेट में हैं।इनमें दिल्ली, चंडीगढ़, अंडमान-निकोबार, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पुडुचेरी शामिल हैं।

राज्य कितने संक्रमित कितने ठीक हुए कितनी मौत
महाराष्ट्र 9318 1388 400

गुजरात

3774 434 181
दिल्ली 3314 1078 54

राजस्थान

2364 770 52
मध्यप्रदेश 2387 373 120
तमिलनाडु 2058 1128 25
उत्तरप्रदेश 2053 462 34
आंध्रप्रदेश 1259 258 31
तेलंगाना 1009 374 25
पश्चिम बंगाल 697 109 20
जम्मू-कश्मीर 565 176 8
कर्नाटक 523 207 20
केरल 486 359 4

पंजाब

342

101

19
हरियाणा 308 224 3
बिहार 366 64 2
ओडिशा 118 38 1

झारखंड

105 19 3
उत्तराखंड 54 34 0
हिमाचल प्रदेश 40 22 2
असम 38 27 1
छत्तीसगढ़ 38 34 0
चंडीगढ़ 56 17 0

अंडमान-निकोबार

33 18 0
लद्दाख 22 16 0
मेघालय 12 0 1

पुडुचेरी

8 4 1
गोवा 7 7 0
मणिपुर 2 2 0
त्रिपुरा 2 2 0
अरुणाचल प्रदेश 1 1 0
मिजोरम 1 1 0

ये आंकड़े covid19india.org और राज्य सरकारों से मिली जानकारी के अनुसार हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में 29 हजार 435 संक्रमित हैं। इनमें से 21 हजार 632 का इलाज चल रहा है, 6868 ठीक हुए हैं और 934 की मौत हुई है।

5 राज्य और 1 केंद्र शासित प्रदेश का हाल

  • मध्यप्रदेश, संक्रमित- 2387: यहां मंगलवार को कुल 222 नए मरीज मिले। इनमें इंदौर सेंट्रल जेल के 19 संक्रमित कैदी शामिल हैं। इन्हें अस्थाई जेल में शिफ्ट किया जाएगा। अब तक इंदौर में 1372, भोपाल में 458 और उज्जैन में 123 मरीज मिल चुके हैं।
जबलपुर के एक थाने में खड़े ये वाहन लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों से जब्त किए गए हैं। मध्यप्रदेश में पिछले करीब एक हफ्ते में कोरोना संक्रमण तेजी से फैला है।
  • उत्तरप्रदेश, संक्रमित- 2053:प्रदेश में मंगलवार को 67 लोगों की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इनमें सबसे ज्यादा 17 मरीज आगरामें मिले। इसके बाद 13 रिपोर्ट वाराणसी में पॉजिटिव आईं। राज्य में आगरा में सबसे ज्यादा 401 संक्रमित हैं। यह बीमारी यहां 75 में से 60 जिलों में फैल चुकी है।
यह तस्वीर प्रयागराज की है। लाइन में लगे ये छात्र अपने घर पहुंचने के लिए वाहन का इंतजार कर रहे हैं। ये लॉकडाउन की वजह से दूसरे राज्यों में फंसे थे।

महाराष्ट्र, संक्रमित- 9318:यहां मंगलवार को 728नए मामले सामने आए। इसी के साथ राज्य में संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 9 हजार 318 तक पहुंच गई है। 5 हजार 982 संक्रमित अकेले मुंबई में हैं। राज्य में इस बीमारी से अब तक 400 लोगों की मौत हो चुकी है।

मुंबई में प्रवासी मजदूर मुफ्त में बांटा जा रहा खाना लेते हुए। लॉकडाउन की वजह से इनका रोजगार छिन गया है। अब ये वॉलंटियर्स की ओर से बांटे जा रहे खाने पर ही गुजारा कर रहे हैं।
  • राजस्थान, संक्रमित- 2364:यहां मंगलवारको 102 मरीजों की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई।इनमें जयपुर में 26, जोधपुर में 25, कोटा में 24, अजमेर में 11, टोंक में 8, धौलपुर में 4, जबकि बांसवाड़ा, नागौर, सीकर और उदयपुर में 1-1 मरीज मिला है।
जयपुर में एक व्यक्ति अपने डॉगी के साथ घर की खिड़की से सूनी सड़क को देख रहा है। लॉकडाउन को एक महीने से ज्यादा हो गया। अब लोग घरों में रहकर ऊबने लगे हैं।
  • बिहार, संक्रमित- 366:यहां मंगलवार को संक्रमण के 20 नए मामले आए। इनमें से गोपालगंज में 6, कैमूर भबुआ में 4, जेहानाबाद में 3, मुंगेर में 2, जबकि बक्सर, बांका, सीतामढ़ी, शेखपुरा औरअररिया में 1-1 मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। राज्य में कोरोना केसबसे ज्यादा 92 मरीज मुंगेर में हैं।
पटना में पुलिसवाले दूसरे प्रदेश के लोगों से पूछताछ करते हुए। लॉकडाउन में सड़कों पर पुलिस तैनात है। ऐसे में कुछ लोग रेलवे ट्रैक के रास्ते शहर की सीमा पार कर रहे हैं।
  • दिल्ली, संक्रमित- 3314:यहां मंगलवार को नीति आयोग के एक अफसर समेत 206 पॉजिटिव मिले। इसके बाद दिल्ली स्थितबिल्डिंग को दो दिन के लिए सील कर दिया गया। इस दौरानपूरी बिल्डिंग को सैनिटाइज किया जाएगा। वहीं, सफदरगंज अस्पताल में भर्ती सीआरपीएफ सब इंस्पेक्टर ने दम तोड़ दिया। 12 नए जवान संक्रमित मिले हैं। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में कोरोना संक्रमितों की संख्या 47 हो गई है।
दिल्ली में एक स्थानीय व्यक्ति ने यमराज का रूप रखकर गले में कोरोनावायरस की माला पहनी है। ये गलियों में घूमकर लोगों को इस महामारी के प्रति जागरूक कर रहे हैं।


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उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में एक वाहन को कोरोना की शक्ल दी गई है। इसे दिन भर सड़कों पर घुमाया जाता है और प्रचार करके लोगों को इस महामारी के प्रति जागरूक किया जाता है।


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